पंख समय के
उड़ता जाता है समय पंख लगाकर
किसी की पकड़ में नहीं आता
बदलती परिस्थितियों का बस
अहसास करवा कर निकल जाता ।
गुजर जाते हैं अनचाहे दिन भी
अच्छे की इंतज़ार में
इकट्ठी होती रहती हैं खट्टी ,मीठी यादें
कांच जैसे ज़िन्दगी के जार में ।
कभी नहीं छूटने देना दामन
‘ आशाओं ‘ को थामे ही रखना
टूटे हुए कांच के ऊपर से
बचके ही तो पड़ता है निकलना ।
मरहम लगा देता है समय भी
गहरे घावों को सहलाकर
तूफ़ान सा उड़ता समय ले जाता साथ में
अच्छा बुरा सब उड़ाकर ।
दिखती है लौ जब रोशनी की
अन्धेरा पास भी नहीं फटकता
उड जाता है समय पंख लगाकर
किसी की पकड़ में नहीं आता ॥
Umid pe duniya kaym 👍
ReplyDeleteSamya sabko yaad rakhta hai
ReplyDeleteGreat poem manju ji