दृढ़ निश्चय
अध्याय ३
सब सुनकर प्रिया हैरान हो गई और ‘पुतले के जैसे’ खड़ी रह गई ,जैसे उसके शरीर से जान निकल गई हो। , दिमाग़ और दिल ने काम करना बंद कर दिया हो । जिस चीज़ की उसने कल्पना भी नहीं की थी, वो आज हो रहा था। जिनके लिए उसने अपने सुख-दुख त्याग दिये ,अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी उन्होने ही उसकी इज़्ज़त नहीं की, तो अब उनकी पत्नियां क्यूँ ही करेंगी ।
घुट-घुटकर एक-एक दिन निकल रहा था । हर रोज़ सुबह उठते दिमाग़ में एक ही ख्याल आता ”आज पता नहीं क्या होगा”।फिर वो दिन भी दूर नहीं रहा, जिसका कोसों दूर भी दिमाग़ में ख़याल नहीं आया था । एक हाथ से चौखट का सहारा लेकर चुपचाप सुनती ही रह गई ,जब उसकी भाभियों ने उसे सीधे-सीधे आकर घर से निकलने को कह दिया । भाइयों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिला दी कि घर में ज़्यादा सदस्य हो गए हैं और जगह की कमी लगने लगी है, “आप अपना रहने का कोई बंदोबस्त कर लो”। आप कहें तो हम अनाथाश्रम में आपके लिए बात कर लेते हैं ।
उसने अपना मकान भी बहुत पहले अपने दोनों भाइयों के नाम कर दिया था ।उसका न कोई रिश्तेदार था न ख़ुद का घर -बार । उसे कौन रखेगा जब सगे भाइयों ने ही “किवाड़ खोल दिए घर से बाहर निकालने के लिए” । वह अब अपने माथे पर बार-बार हाथ मार कर रोए जा रही थी ।उसने कल्पना भी नहीं की थी कि उसके सगे भाई भी एक दिन ऐसे बदल जाएँगे । यूँ बेघर नहीं होती ,”अगर अपना कुछ सोच कर रखा होता तो” ।
“ कुछ दे दो, भगवान आपका भला करेगा, भगवान आपकी तरक़्क़ी करेगा “ ये शब्द उसके कानों में पड़े तो वह अपने विचारों से चौंक कर बाहर निकली और भिखारन को माँगते हुए देखकर अंदर तक कांप उठी । To be continued………,
So sad
ReplyDeleteWaiting for upcoming part
Umid h end acha hi hoga 👍
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