स्वाभिमानी
अब भी याद आ रही है धुँधली सी परछाई उसकी ,
गोदी में लटकाए हुए बच्चे को चली जा रही,
बोझ नहीं बनना इसलिए काम तलाश रही,
ढूँढ रही है रोज़ी-रोटी गलियों में भटकते हुए ,
ज़िल्लत के नहीं, इज़्ज़त के दो टूक के लिए ।
ताने लोगों के ‘तलवार से ज़ख़्म’ दे रहे
मदद की उम्मीद वो भी पत्थरों की बस्ती में ।
ना सपने देखे आँखों ने ,न टूटने का डर है
तमाशा नहीं बनाना ज़िंदगी को
पर सँवारनी तक़दीर भी है
छिड़ ही गई लंबी जंग ये
स्वाभिमान और भूख से है ।
ज़िंदा ‘ज़मीर’ भी रखना,हाथ भी नहीं फैलाना है
ढूंढनी है मंज़िल अपनी और ‘स्वाभिमान’ भी बचाना है ।।
Dedicated to all women . Happy woman's day
ReplyDeleteHappy women’s day
ReplyDeleteNari tu narayni
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