स्वाभिमानी

अब भी याद आ रही है  धुँधली सी परछाई उसकी ,

गोदी में लटकाए हुए बच्चे को  चली जा रही,

 बोझ नहीं बनना इसलिए काम तलाश रही,

ढूँढ रही है रोज़ी-रोटी गलियों में भटकते हुए ,

ज़िल्लत के नहीं, इज़्ज़त के दो टूक के लिए  ।

ताने लोगों के ‘तलवार से ज़ख़्म’ दे रहे 

मदद की उम्मीद वो भी पत्थरों की बस्ती में ।

             ना सपने देखे आँखों ने ,न टूटने का डर है 

             तमाशा नहीं बनाना ज़िंदगी को

              पर सँवारनी तक़दीर भी है 

               छिड़ ही गई लंबी जंग ये 

                स्वाभिमान और भूख से है ।

 ज़िंदा ‘ज़मीर’ भी रखना,हाथ भी नहीं फैलाना है 

ढूंढनी है मंज़िल अपनी और ‘स्वाभिमान’ भी बचाना है ।।

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