ज़िद्द जीतने की
डर दिल में जगे या किसी को देखकर लगे ,
खोखलापन भर जाता है ज़िंदगी में भी ।
निकल जाये डर ‘रूह’ से अगर ,
आमना -सामना हो ही जाए डटकर ,
तो मंज़िल का रास्ता मिल ही जाता है ।
अंदर से झकोर कर उठाना होता है ख़ुद को ,
अपनी ‘कमज़ोर सोच’को ही बनाना होता है ताक़त,
रखते हुए क़दम हौसलों की सीढ़ियों पर,
जकड़ते हुए डर को रौंद कर आगे बढ़ना होता है ।
डर पर ही नहीं बेबसी और लाचारी पर भी,
बुलंद करके हौसले जीत जाना होता है।
जीतने की ज़िद्द कर ही ली तो ,
जख्मों को भी भूलाकर आगे बढ़ना होता है।
मदद ख़ुद की करेंगे तभी तो क़िस्मत देगी साथ ,
नहीं देखना मुड़कर पीछे ‘ज़िद्द है’बस जीत जाना है ।।
Sabko padti hai jindgi me jitne ki jidd ki jrurat kabhi na kabhi.
ReplyDeleteVery beautiful
Mn k hare har h mn k jite jit👍
ReplyDeletevery well written
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