ज़िद्द जीतने की

डर दिल में जगे या किसी को देखकर लगे ,

खोखलापन भर जाता है ज़िंदगी में भी ।

निकल जाये डर ‘रूह’ से अगर ,

आमना -सामना हो ही जाए डटकर ,

तो मंज़िल का रास्ता मिल ही जाता है ।

अंदर से झकोर  कर उठाना होता है ख़ुद को ,

अपनी ‘कमज़ोर सोच’को ही बनाना होता है ताक़त,

 रखते हुए क़दम हौसलों की सीढ़ियों पर,

 जकड़ते हुए डर को रौंद कर आगे बढ़ना होता है ।

                 डर पर ही नहीं बेबसी और लाचारी पर भी,

                 बुलंद करके हौसले जीत जाना होता है।

                 जीतने की ज़िद्द कर ही ली तो ,

                जख्मों को भी भूलाकर आगे बढ़ना होता है।

               मदद ख़ुद की करेंगे तभी तो क़िस्मत देगी साथ ,

             नहीं देखना मुड़कर पीछे ‘ज़िद्द है’बस जीत जाना है ।।

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