गॉंठ सबक की



आता है एक समय  सबकी ज़िंदगी में

 गुज़रना ही पड़ता है अनचाहे दौर से ,

न चाहते हुए भी कुछ समझौते पड़ते हैं करने

आकर किसी पड़ाव पर गाँठ बाँधनीं पड़ती है कसके ।

अपने मन की उथल-पुथल को रखते हैं क़ाबू

 खोल ना दे  “किताब”, दिमाग़ कभी यूँही कहीं जाके ,

बिना वक़्त देखें बह ना जाए जज़्बात दिल से निकलकर 

 सबक ना दे जाये बेक़ाबू ज़ुबान ही फिसल के ।

तुफान आते रहते हैं ज़िंदगी में  बदल देते हैं सब कुछ 

 तबाह हो जाते है ‘पूरे के पूरे कुनबे’ एक ग़लत फ़ैसले से ,

ज़िंदगी के हर दिन हर मोड़ पर  मिलते हैं सबक़ 

कुछ छप  जाते हैं दिमाग़ में तो कुछ मिट भी जाते 

 तो बाँध लेते हैं” गाँठ सबक की” जीना है अगर सुकून से ।।

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