जुगलबंदी

टहलते हुए जंगल में 

 उस अकल्पनीय दृश्य ने खींचा ध्यान मेरा 

मोर कोयल संग ,इकट्ठे होकर परिंदे 

जंगल में घूम-घूमकर शोर मचा रहे ,

  फिर भीनी भीनी ख़ुशबू महसूस हुई 

नज़रें ऊपर उठी और क़दम बढ़ते चले गए ,

जंगल में गुलमोहर के पेड़ों पर 

फूल आ रहे हैं झोली भर-भर के 

गिर गई पत्तियाँ वृक्षों से

रंग बिरंगे फूल टहनियों पर सज गए ,

 लाल ,गुलाबी ,जामुनी, नीला ,पीला 

पूरे जंगल का ही तो रूप बदल गए ,

कोयल ने भी शोर मचाकर मोहर लगायी है

 ‘राजा पेड़ आम’ की नयें फलो से शाखाएँ भर आयी है ,

पक्षियों ने कर जुगलबंदी महफ़िल सजाई हैं 

पेड़ों की शाखाओं  पर कूद कूदकर कोयल ने तो

 नई फ़सलों की  ‘बधाइयाँ ‘ भी गाईं  है ।


आज  परिंदों और झूमते पेड़ों की “जुगलबंदी” में 

वक़्त  बिताना लगभग  सार्थक  हो गया

 इस अद्भुत नज़ारे से मन का कोना-कोना 

नई स्फूर्ति भर कर प्रफुल्लित हो गया  ।।

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