दोबारा

रह जाती हैं ख्वाहिशें अधूरी बहुत सी,

                फिसलने लगती हैं मुट्ठी से ,ढीला छोड़ते ही 

कोशिश तो करते छूटते हुए को,  पकड़ने की कस के ,

       पर-‘दोबारा’ पाने की होती ख़ुशी ,हाथों मे आने पर ही ।

एक एक लम्हे से ज़िंदगी सँवर जाती है 

हार मिलने के बाद भी

 नई शुरुआत इंतज़ार कर रही होती है ,

नहीं होता सब कुछ ख़त्म , किसी का भी 

पड़ता है जब जीना, हर हाल में सबको ही ,

कुछ जज़्बात दफ़न करके तो 

कुछ सपने नये बुनकर  

 खड़ी करनी पड़ती है ज़िंदगी फिर ‘दोबारा’ भी 

अपने ख़ाली पन्नों को रंग बिरंगी यादों से भरते रहना

                “ ज़िंदगी बहुत क़ीमती है”

                करवाना एहसास ख़ुद को ‘दोबारा’ भी ।।

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