ज़रूरी तो नहीं

 मन शांत तो घर ही मंदिर जैसा

 मन अशांत तो मंदिर भी कुछ नहीं 

अकेले रहो या भीड़ में 

क़दर खुदकी नहीं की, तो ख़ुशी कहीं भी नहीं 

सब आपका भला ही सोचें,  ज़रूरी तो नहीं ।

कोई ज़रूरी तो नहीं—

 हम ज़िद पर अड़ जाए तो मनचाहा ही मिले

 हम सबसे अलग दिखे और ध्यान हम से ना हटे

खींच कर ‘बढ़ती भीड़’ से ख़ुद को 

तुम्हारा मन मुताबिक़ करना 

पसंद आये सबको ये ज़रूरी तो नहीं ।

चुनिंदा ही रखना ख़्वाहिशें अपनी 

नहीं मनाता कोई अब तो ,रूठना भी नहीं 

हर कोई आपका हितैषी हो  ज़रूरी तो नहीं ।


खटकते होंगें  कईयों की आँखों में

 तुम भी ‘अनचाहे’ की तरह

 सब  सिर-आँखों पर रखें तुम्हें  “ज़रूरी तो नहीं” ।।

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