छूट गया
न चाहते हुए भी छूट गया था
छूट गई गाँव की गोद, लाचारी में
रह गया भाईचारा भी वहीं इस महामारी में
ढूँढा बहुत नहीं मिला वो सुकून,बाहर भी जाकर
जो जाते जाते ,मेरे गाँव ही छूट गया था ।
नहीं मिली कहीं मिट्टी पानी की सोंधी सी ख़ुशबू
वो चुल्हे के ‘रोटी साग’ का बेहतरीन स्वाद
पकते हुए दूध की न भूलने वाली, मलाई की मिठास
तपतपाती गर्मी के दिन, ऊपर पड़ती सूर्य की तपन
प्यास बुझाने को था बस ,वो गहरा कुआँ
जो जाते जाते,मेरे गाँव ही छूट गया था ।
तलहटी में पहुँचा रहता था जिसका पानी
बारिश के दिनों में बढ़ता ,वो भी आधा अधूरा
जो नहीं पहुँच पाया कभी किनारे तक, चाह कर भी
झाँक कर कुएँ में पलटकर गूंजती आवाज़ें
मन को उत्साहित करने वाला पंछियों का शोर
जो हमेशा के लिए मेरे गाँव ही “छूट गया”था ।।
Buli bisri yade 👍
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