ख़ामोशी

गुफ़्तगू  की है आज ,रात की ख़ामोशी से 

रात तो तारों वाली ही है ,पर चमक थोड़ी फीकी है,

 यूँ तो चाँदनी भी फैल रही है थोड़ा थोड़ा करके 

घूमते बादलों ने आसमाँ पर ,ज़रा सी छाप छोड़ी है ।


 ख़ुशी और सुकून देने वाले है ये पल 

पक्षी भी सो रहे ,पेड़ों ने भी चादर ओढ़ ली है ,

 बतिया रहे है चाँद तारे भी, जैसे फ़ुरसत में 

हवा के लिए आज ‘चहलक़दमी’ ही काफी है ।


‘शब्द’  ढूंढ रही हूँ लिखने के लिए 

जो ‘बखान’ कर सकें इस ख़ूबसूरती का ,

आँखें देखना चाह रही है, चुपचाप बैठ कर 

दिल तो बस, महसूस करने में ही ‘राज़ी’ हैं ।


चुप रहकर ‘बहुत कुछ’ कहे जा रही 

                       यह  बितती रात की “ख़ामोशी” है ।।

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