हक़ीक़त

दिखा ही दिया आइना वक़्त ने ,

आत्मसात करवाया हक़ीक़त से

 बदनाम हूँ मैं बदलने के लिए, पर

 मुझसे ज़्यादा तो यहाँ लोग बदलते हैं ।


दिखता हूँ मैं, महसूस होता हूं, बदलता हुआ 

लोग तो पीठ मोड़ने का,मौक़ा भी नहीं देते हैं ।


यक़ीन ना हों तो करके देखना कभी, एक बार तो यक़ीन 

 विश्वास की ओट में छुप-छुपकर, वार अपने ही करते हैं ।


अच्छा भी वक़्त, बुरा भी वक़्त ,

सब कुछ क्या वक़्त ही करता है 

कोसते हैं वक़्त को मिलकर सारे

 “हक़ीक़त”  में  धधकती मशालें 

                    ख़ुद लिए फिरते हैं ।।

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