उड़ा लो साथ

पिंजरे में बैठा, 

देख रहा आसमाँ को ,बेबस नज़रों से 

 उड़ते पंछियों में जगा रहा है जोश ‘थोड़ा और उड़ो’ 

 आज तो छूके  ही आना,  उन्मुक्त गगन को ,

 आ-जाना थोड़ी देर ,मेरे घर की मुँडेर पर भी,

बाँटना चाहता हूँ सुख दुःख, बुला रहा हूँ सबको ही ।


पंख तो मेरे भी हैं, 

दिल भी कर रहा है खुले में उड़ने के लिए , 

कूद-फाँद करने के लिए , ऊँची उड़ान भरने के लिए ,

ज़िंदगी ऐसे ही गुजरेगी,मजबूर हूँ पिंजरे में रहने को

 कुछ पल ही आ-जाओ ,दिखाऊँ दिनचर्या तुमको ।


 दाना-पानी तो है,

मेरे पिंजरे में भी है सजाया हुआ

पर नहीं है वो आज़ादी जो ,  तुम जी रहे ,

जी रहे बेफिक्र रहकर , उड़ रहे बेपरवाह होकर 

करवा दो मुझे भी आज़ाद, तोड़ दो पिंजरे को ,

“उड़ा लो साथ” अपने,  इस कैद से रिहा करवाकर ।।

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