लिखूँ कुछ ऐसा
सोचा है
कुछ नया, कुछ अलग सा लिख दूँ
अच्छी लगे सबको ऐसी नई रचना कर दूँ ,
दुरुस्त क़लम को भी किया ,तराशा है थोड़ा सा
चलते रहना ‘हाथ थाम’ कर, आज मेरे लफ्जों का
लिखना है कुछ ऐसा जो ,उतर जाए सबके ही ज़हन में ।
‘शब्द जो-
गिरते हुए को उठा दें ,लड़खड़ाते को सँभाल लें
दिलासा दे कमज़ोर को और रोते हुए को हंसा दे ,
पढ़ते जिनको दिलासा मिले , टूटते हुए दिल को
बढ़ जाये स्वाभिमान ,ऐसा उन ‘शब्दों का निचोड़’ हो
लिखूँ कुछ ऐसा ,उन शब्दों पर सबकी ही कमान हो ।
‘जाग उठे-
सोया हुआ ज़मीर ,उन शब्दों की खनखनाहट से
मर्यादा में रखना मेरे लफ़्ज़ों को ,विनती की है भगवान से ,
मिल जाए शब्दों को साथ ‘क़लम जैसी पतवार’ का
“लिखूँ कुछ ऐसा” खिल जाए .बगिया सी शब्दों की
महका दे जीवन सबका ।।
Kya bat h lekhika ji 🙏
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