रूबरू
होकर देखना रूबरू कभी, अपने अंतर्मन से
बहुत से सवालों के मिल जायेगें जवाब ,
सुलझेंगी बुरी तरह फँसी ,बहुत सी दुविधाएँ
गाँठें खुलनीं शुरू होंगी काफ़ी उलझनो की ।
साफ़ कर लेना चिपके हुए
जालों को हाथों से खींचकर
गहरी जमी परत ,धूल की हटा लेना मन से
एक-एक दिन का हिसाब करके देखना
कोई वक़्त बेहतर तो कोई बदतर
पूरी किताब ही खुलेगी ज़िंदगी की ।
जो दिन कल आना है,
पकड़ लेना आगे बढ़ उसको
फैलाकर दोनों बाँहें अपनी ,
वक़्त बुरा ही सही, बित ही गया जब
उस पर अब ,समय गवाना नहीं ।
कितनी ही आशाओं के,पलटते पन्नों का
शोर गूंज रहा हैं जीवन में
कभी “रूबरू” होकर ,ख़ुद से
कोशिश करना सुनने की ।।
Khuli kitab 👍
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