अक्खड़
अपना ही वजूद
जब भी तलाशने लगे है, कभी
‘खुलकर’ आना ही पड़ा, ज़माने के सामने,
होता ही गया, सब उसूलों का
‘लेखा-जोखा’ भी,फिर तो ।
बनाये कुछ उसूल-
दायरा भी बनाया उनका ,
था ही नहीं, जो गिनती में
उसको भी रख लिया ‘मन मारकर’,
डिगने नहीं दिया आत्मविश्वास कभी
चलते रहे सिर उठाकर उम्र भर ।
है तो ‘अक्खड़’-
शायद , बहुतों को लगता भी होगा ,
करते ही नहीं कभी, खुलकर व्याख्यान अपना
‘उसूल’ जो ख़ुद, खुद के लिए बनाए थे कभी
रहे है हमेशा से ‘कट्टर बनकर’ ही
रोक देते है अब भी, बहकते हुए क़दम ,
हम जैसे “अक्खड़” के, पीछे खींचकर ।।
Damdaar just like you
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