थोड़ी सी नमी

मॉं तो नहीं थी

पर, ‘मॉं जैसी’ ही लगी मुझे

 झाँकती ही रही उनकी आँखों में 

जिनमें शायद मिल सकूं कहीं,

दिखे छलकता हुआ अपनापन

मिल जाए ‘अपने लिए परवाह’  थोड़ी सी ।


लटक जाऊँ जाकर पीठ पर धीरे से

 ‘लिपटा लूँ’ अपनी बाहों को फैलाकर,

महसूस ही हो जाए,  शायद 

अतरंगी सा एहसास पास जाकर,

बेचैन भी हुई , 

‘देख बेचैनी उनकी’ 

उनकी वो कुछ ढूंढती हुई सी नज़रें 

टटोलते हुए सामान को  ‘झोले में’

जैसे खो गया हो ,यहाँ ही आकर ।


थी समुद्र सी गहराई, 

फिर भी ख़ाली सी आँखें

दिखी  “थोड़ी सी नमी” जो,

छुपी हुई थी एक कोने में 

 कह रही थी बहुत कुछ—

        एक एक क्षण में ।। 


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