पत्र आया ज़िंदगी को

तर-बतर करती बारिश, ‘रोम-रोम जगाती’ हवा 

हो रहा है सब तरोताज़ा, झूम रहा मन,

बार बार झाँक रहा है सूरज भी आकर

‘तार पर लटकती’ हुई बूंदों को, इंद्रधनुष बनाकर ।


शायद इस ‘ख़ुशनुमा मौसम’ ने ही 

ज़िंदगी को पत्र भिजवाया है,

महक जाओ, चहक लो,उन्मुक्त परिंदे बनके,

‘भर लो नई स्फूर्ति’ से ख़ुद को 

जगमगाने लगो चमकती किरणों के ही जैसे ।


देर से ही सही, अब आ गई-

ढूंढते हुए ज़िंदगी,  हमारा भी पता

 बहुत इंतज़ार किया, अब जाके ‘पत्र आया ज़िंदगी को”,

‘जी-भर जी लेते हैं अब, ये कुदरत से मिले पल

संजो भी लेते हैं, सब यादें बनाकर

‘अब उठ जाओ’,भिजवा दिया है ये संदेश,

                    अपने सोये अंतर्मन तक ।।


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