गुज़रता वक़्त
टहलते हुए या यूँ कहें
गोल गोल बग़ीचे की परिक्रमा जैसे चलते हुए
मिले कुछ यार आज भी ,
जो मिलते रहते हैं हमेशा से ।
कट रही है कैसी ज़िंदगी
सवाल पहला यही से
बारिस फिर बहुत सारे सवालों की ,
पूछते तो सभी है कैसी बसर कर रहे हो
कैसे कैसे गुज़ारता हूँ वक़्त ,
नही पुछता कोई भी
शायद लगता होगा सबको ही
करनी ना पड़ जाए तुम्हे ही कुछ मदद
चुप रहकर, पीछे हट जाते होंगे इसलिए भी ।
हँसता भी हूँ मन ही मन उनकी सुनके
कैसे गुज़ारता हूँ —-
मेरे सिवाय किसी को भी सरोकार नहीं ,
अपनी दुनिया अपने समझौते
जी-भर बसर कर भी रहे हैं ख़ुशी से,
ये “गुज़रता वक़्त” है तसल्ली रखिए जनाब
मुड़कर वापस तो आएगा ही नहीं ।।
Nice
ReplyDeleteGreat 👍
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