कुदरत का रचा संगीत
बेजान ही पड़ गया मेरा बजता हुआ संगीत
जिसको बहुत चाव से, छाँटकर लगाया है मैंने ,
ये जोरो से बरसते पानी की बूँदे
नया ही गुनगुना रही है ,
कभी पत्तों पर, कभी दीवारों पर, टप टप करके
नया साज बजा रही है ।
बदहवास से फड़फड़ाते पेड़ पौधे
हवा के वश में हो गए हैं आज
छमछमाती बूँदे बार-बार बदल रही है राग,
लहराता पानी ऊपर से कूद-फाँद करती बूँदें
पानी में भी, झूमते हुए ,विचरने लगे परिंदे ।
प्रसन्न हो गया मन भी
महसूस कर ये अनमोल लम्हे
जो मिल गए हैं आज, बिना फ़रमाइश ,
“कुदरत का रचा संगीत” कमतर आँके भी तो कैसे
मिल गयी नई ताज़गी
नहीं रही उदासी की, अब कोई भी गुंजाईश ।।
Nice
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