एहसानमंद

खिल उठे देखकर उन्हें पल भर में ही 

शायद बरसों बाद हँसे होंगे यूँ खुलकर,

 निकल गए कुछ रुके हुए, दबे हुए एहसास

 हँसते ही रहे बेख़ौफ़ होकर ।


कितने ही ‘बहम’ पाल रखे थे मन में

 माना सोच लिया  एक वक़्त,

 ग़ैर लगने लगता है हर कोई

 दिल ने माना तो, दिमाग़ ने भी हामी भर दी,

 चलते रहे उसी ‘ढर्रे’ पर देखा समझा जो आँखों ने भी ।


 मुस्कुराते ही नहीं 

खुलकर खिलखिलाते भी थे हम कभी,

 टटोली कुछ पुरानी तस्वीरें

 कुछ पुराने क़िस्से याद करने को,

 दिल किया आज भी ऐसे ही ‘हँसे खिलखिलाये’

 और फिर हँसते ही रह गए देख-देखकर उनको ।


“एहसानमंद”  हो गए आज इन पुरानी तस्वीरों के ,

 बरसों बाद वजह मिल ही गई ,

  खुलकर हँसने की , मुस्कराने की ॥

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