एक टीस

सालो बीत गए 

पर अब भी याद आता है 

 वो दुख , जो पहाड़ सा बनकर टूटा था 

‘हिल गई थी नींव’ भी उस मज़बूत महल की ,

बिखर गया देखते देखते   खिला गुलदस्ता

बद से बदतर हो गई स्तिथि 

 परिवार और मुखिया की ।


था नहीं मुक़द्दर में जो, शायद वही गया

 यह तो ‘वो स्तंभ था जो,  ‘बेवक्त हिल गया’

 बिना चिड़िया  चूज़े भी  चिल्लाते हैं याद में,

  भूखे प्यासे ढूंढते है  ‘माँ को’ 

 थोड़ी सी ही आवाज़ पे ।


बिना आहट किये बिछुड़ जाते हैं 

जिनके बिना ‘साँस भी नहीं आती’

 बहुत दूर  सफ़र पर गए शायद 

इसलिए आवाज़ भी नहीं आती,

उभर आया फिर ‘पुराना दर्द ,जोरों से सीने में 

“एक टीस”   अब भी बची हुई है 

           दिल के ही किसी कोने में ।।

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