उतर जाना खरे
झोली छोटी पर, ख़्वाहिशें बहुत थी
‘रब के अलावा’ हाज़िरी कहीं नहीं थी
उम्मीद रूकती तो क़िस्मत पर ही आकर ,
खोटा सिक्का भी मिल गया अब
‘खनकते ढेर’ में जाकर ।
तक़दीर को कोसना कोई हल नहीं था
ज़रूरतें न हो सकी थी पूरी तो भी
‘क़िस्मत का दोष’ तो कहीं नहीं था ।
सब होता ही चला गया अब
यह किसी ‘सपने से कम’ भी नहीं,
होने लगा एहसास बदलती फ़िज़ाओं का
ऐसा क़िस्मत और सपनों का तालमेल
पहले तो कभी देखा नहीं ।
कदम खुद ही उठने लगे तो-
‘साथ अपने भी’ खड़े हो गए आकर,
दिया आदेश ख़ुदा और क़िस्मत ने ही शायद
मोड़ दो रुख़ हवाओं का,
बस “‘उतर जाना खरे” तुम भी अब
अपनी उम्मीदों पर ।।
Nice
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