चक्रव्यूह सी ज़िंदगी

कभी हथौड़ा तो कभी,  नुकीली कीलें 

कट-फटकर हाथ भी,  बुरी तरह से छिले

उतारता जा रहा ‘आरी’  चला-चलाकर 

नया बनाने के लिए, वो ‘फटा-पुराना’ कपड़ा ।

 


माथे पर पसीना,  सिर पर ‘छोटी सी टोपी’ 

बड़ी शिद्दत से हाथ चलाता हुआ ,

शिकन नहीं है थोड़ी सी भी 

ना ही परेशानियां झलकतीं दिखी चेहरे पर ,

 ‘फ़ुरसत से बैठने की’ गुंजाइश आसपास भी नहीं

  कमर झुकाकर बस, करता ही रहा काम ‘लगातार’ ।

 


 रुकते ही हाथ ,  दिमाग़ भी करता है ‘सजग’ 

 घर परिवार के हालात, याद दिलाता होगा ,

फिर ध्यान भटकता है-

कभी पेट तो कभी, बच्चों पर ,

क्यूं बन गई “चक्रव्यूह सी ज़िंदगी”  

 बिना विचलित हुए शायद ही  

 ‘कोई दिन’ गुजरता होगा ॥

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