वो प्यारा एहसास छुटपन का


बचपन जहाँ  बीता 

 वो दरवाज़ा ,वो जोहड़ ,बरगद का पेड़ ,

 गली से गुज़रती, बग्घी की लाईनें

 भैसों का एक साथ  जगह रोक रोक चलना 

हवा की वही ख़ुशबू, 

जो बसी हुई थी,  रूह के किसी कोने में अब भी

 जी आयी हूँ सब पल, फिर से कुछ ही लम्हों  में ।


 रिश्तेदारों के साथ 

बड़े होने का  नहीं हुआ एहसास,

 पुचकारते हुए सिर पर हाथ, ढेरों आशीर्वाद

 हटने का मन ही नहीं उनके सीने से ,

 रोकूँ भी तो कैसे , इन पलों को

 भर-भरकर कैसे समेटूँ, अपनी यादों के झोले में ।


समय का तक़ाज़ा 

चलने की इच्छा बिलकुल नहीं ,

अब शायद,  हो न हो यहाँ फिर से आना 

गली का आख़िरी छोर 

थक गई आँखें भी  निहार निहारकर,

फिर से सब कुछ तरोताज़ा हो गया

मेरा   “वो प्यारा एहसास छुटपन का ।।

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