बस आज की ज़रूरत
मेरे हाथों से ज़्यादा, हाथ काँप रहे थे उसके
‘हाथ सुन्न’ कर देने वाली ठंड को सहन कर करके।
चमक गई थी आँखें फिर भी, देख मुझ ‘ग्राहक’ को
तेज कर दी आँच गर्माहट देने मूंगफली को ।
देखते देखते ठंड होती जा रही थी काफ़ूर
कुछ ग्राहक देख कुछ बड़ा ऑर्डर सुनके ,
और कुछ ‘लकड़ियों की आँच’ से ।
‘फटी पुरानी बोरी’ को नीचे खींच-खींचकर
सिंहासन सा बना, बैठ गया पल भर में ।
शायद बहुत वक़्त के बाद कोई आया है
‘धूल मिट्टी पोंछ’ दिखाता रहा सामान को ।
डर था कभी शाम ढलने तक कोई आए ही ना
बातें सुनाकर छिपा रहा था अपने ‘मन के डर को’ ।
बार बार दिखाता रहा पैकेट भी ‘रोकते रोकते’
“बस आज की ज़रूरत” कैसे भी हो जाएं पूरी ।
कल की दाल रोटी फिर से
क़िस्मत और ऊपर वाले पे
मुस्कुराकर छोड़ दी मन ही मन में ।।
Very nice
ReplyDelete