मन की रेलगाड़ी
‘मन’ है ही एक रेलगाड़ी
जिसमें सफ़र कर रहे,
विचार रहते हैं ‘उधेड़बुन में’
डिब्बे से डिब्बा जोड़कर, बिना विचलित हुए,
हालातों को क़ाबू रखकर,
‘देखते हुए अगत’ भी
निर्धारित समय पर, अपने गंतव्य पर
पहुँचाता भी है ज़रूर ।
पटरी भी है टेढ़ी मेढ़ी
बार-बार मोड़ भी आने हैं बहुत ,
‘पकड़ भी रखनी’ है, कभी रुककर
कभी तीव्रता का सहारा लेकर ,
इच्छाएँ ही नहीं मक़सद भी
पूरे करते रहने है ज़रूर ।
पार करते हुए उलझनों को
‘बनकर पटरी’ सा ,
पहियों से भी बनाकर तालमेल
समझते हुए ‘नज़ाकत वक़्त की’
बिना टालमटोल किए
इस “मन की रेलगाड़ी” को
उस आख़िरी स्टेशन तक
पहुँचना भी तो है ज़रूर ।।
Right 👍
ReplyDeleteDeeply explained 👍
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