अपनों की तलाश

 आज

 बहुत बार क़लम उठायी 

संजोना चाह रही थी उन हसीन पलों को

  बोलते हुए से अक्षरों में लपेटकर ,

 जो साथ बिताये थे हँसते हँसाते 

कुछ ही समय पहले, अपने परिजनों संग ।


लेकिन 

नही पता क्यों, नहीं लिख पा रही 

 बार बार उस उस औरत पर  जा रहा था ध्यान,

 पेड़ के नीचे बैठी घूरे जा रही थी 

आने जाने वालों को

 पढ रही थी  सबके चेहरे

 गहनता से टकटकी लगाकर ,

शायद बिछड़े हुए अपनों की, थी उसे तलाश 

तरस रही थी, थी गले लगाने को आतुर ।


सामान 

 दोनों हाथों से ऊपर उठा, लगातार हिलाकर 

मुस्कुरा भी जाती थी, बीच बीच में थोड़ा थोड़ा 

कुछ याद करके गाना सा, गुनगुना  रही थी ,

अनजान राहें थी सारी, उसके लिए तो  

बैठ जीती थी सुबह ही आकर, 

इन्हीं कपड़ों में,  ठीक इसी जगह ,

 उन बूढ़ी आँखों में “अपनों की तलाश”

         नहीं पता,   कब से ही जारी थी ॥

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