बैरी हो गया चाँद

 पहली बार नहीं 

बहुत बार सजे देखा है उसको 

आज कुछ ‘अलग ही रूप’ निखरा है ,

चटक रंग  साड़ी,  रंगबिरंगी चुडियां

 माँग सिन्दूर भरी, माथे पर ‘सोने का टिका’ है ।


होले-होले  मुस्कुरा रही है 

 मेहंदी  को भी बार-बार निहार रही है ,

 ‘दूर देश’ गया है साजन उसका 

 दिल में पास होने का एहसास जगा रही है ।


 बैरी चाँद भी आएगा  धीरे-धीरे देर करके

 ‘कब ले जाएगा संदेश’  उस दूर देश  में ,

देख रही है आसमान को   बेचैन सी होकर 

गया कहाँ चाँद आज,  ‘चाँदनी को समेटकर’ ।


शायद तारे भी ‘गुहार लगा रहे’ है 

 टिमटिमा रहे है साथ में 

थाली सजी देख पूजा की , हाथ में 

आज तो “बैरी हो गया चाँद” भी, उसके लिए 

               तरस गई है आंखें भी इंतज़ार में ।।

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