दिल से इज़्ज़त
आज फिर से, उन्हीं के बारे में सोच रही थी।कुछ रिश्ते ऐसे भी होते है जिन्हें भगवान ने पहले से ही बना रखा होता है और उनका आपसी प्यार बेशक़ीमती होता है जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती ।
ये बेमिसाल प्यार उनका,जिन्हें ‘‘सौतेली माँ और सौतेली बेटी’’ में बाँटा गया। वह बहुत ही छोटी थी जब उसकी माँ का देहान्त हो गया। वह बेसहारा तो नहीं थी पर “उसे माँ की कमी खलती थी”। बच्चों को माँ की गोद में बैठे देखती तो, उसको भी उम्मीद रहती ।
आख़िर भगवान ने उसकी सुन ली और ‘‘उसकी भी ज़िंदगी में माँ आ गई”।
पहले तो “झिझक के कारण” उनके पास नहीं जाना चाहती थी, पर धीरे -धीरे प्यार पनपता चला गया ‘‘और अब उसे भी माँ मिल गई’’। फूलों के साथ कांटे भी पीछे कयूं रहने लगे।आख़िर मोहल्ले की एक-दो औरतों ने मिलकर दोनों के बीच दीवार बनाने की ठान ली। उनकी एक ही कोशिश, ‘कैसे भी करके लड़ाई हो जाए’’।
जैसे बादल पानी से भरे आते तो है,लेकिन “बिन बरसे” ही वापस जाने पर विवश हो जाते हैं। “ऐसे ही हुई लड़ाई उनकी” पर ,एक सप्ताह दोनों एक-दूजे से मुँह फुलाए उखडी,
उखड़ी-सी, अलग रहने को विवश हो गई ।
आख़िर माँ की ममता कब तक देखतीं । लोगों की परवाह न करके बच्ची को फिर से प्यार करने लगी और बच्ची भी इंतज़ार ही कर रही थी “कब माँ गले लगाये” । सब कुछ सामान्य हो गया और अब तो माँ भी “एक नन्हें बच्चे की” माँ बन चुकी थी।
लोगों की फिर भी वही बात ‘अब ख़ुद की औलाद आ गई तो दूसरे के बच्चे को कहाँ प्यार देगी’’। लेकिन माँ ने दोनों में कोई फ़र्क नहीं समझा उसे भी उतना ही प्यार मिलता रहा।
बेटी को अच्छा पढ़ाया-लिखाया, समय आने पर उसकी शादी भी कर दी ।शादी के बाद फिर से लोगों की यही चर्चा सुनाई दी ।
सौतेली माँ है ‘’कब तक और कितना करेगी”, सगी होती तो पता नहीं क्या-क्या करती।
लेकिन अब लोगों की परवाह करनी छोड़ दी थी माँ-बेटी ने। ‘एक दूसरे को बेख़ुबी समझने लगी थी”। एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती। “दिल से इज़्ज़त” देतीं थी एक दूसरे को । उनका रिश्ता पूरे शहर के लिए मिसाल बन गया , हमेशा हमेशा के लिए ॥
🫶🏼 🫶🏼
Nice
ReplyDeleteGreat 👍
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