उसी मोड़ पर

                       बहुत सालो बाद मिले थे, आज हम । वह वैसी ही थी आज भी ।‘सब कुछ अपने अंदर ही समेटे हुए’ । 

                चेहरे पर वही लुका-छुपी खेलती हुई मुस्कान । बिना पुछे ही- ‘अब तो सब ठीक हो गया” ।  यह कहकर--  रागिनी एकदम चुप हो गई’ । 

           वह जैसे अंदर से निकलने वाले शब्दों को रोक रही थी । “आज भी अपने ऊपर वैसा ही संयम था उसका” ।

             फिर मैंने उसे घर का पता दिया, फ़ोन नंबर भी दिया । “मैंने कहा -  आना घर पर” । 

    और उसने मुझे बिना देखे , आधा-अधूरा सुनकर  सिर्फ़  सिर हिला दिया । 

   और फिर ,  नीचे सिर झुकाकर  उसी मोड़ की तरफ़ चल पड़ी ।  ‘जहाँ से अभी-अभी  आई  थी ‘ । 

                बहुत विचलित थी शायद । या हो सकता है , मुझे ही लग रहा हो --  “पर इतना तो है कुछ तो छुपा रही थी” ।

   उसे जाना कहा था ?  और “मुझे देखने के बाद , इतनी हड़बड़ाहट में वापिस उसी गली में क्यों मुड़ गई” ?

             रागिनी ने अपनी पसंद के लड़के से ही शादी की थी । ‘माँ- बाप तो शादी में शामिल भी नहीं हुए थे’ ।

     उन्हें वह लड़का पसंद ही नहीं था । “समाज में  भी उठ-बैठ नहीं थी उसके परिवार की” ।  

                लेकिन पता नहीं क्या वजह थी ,  जो रागिनी ने उस लड़के से ही शादी की और “अपने माँ बाप को ही छोड़ दिया” ।

       विचलित हो गई थी मैं भी सब सोचकर । पता नहीं क्या हुआ होगा ?  ‘बहुत उथल-पुथल  चल रही थी मेरे अंदर’ ।

            पता ही  नहीं चला, कब मैं अपने घर पहुँच गई । अब वह कब मिलेगी ?  घर का पता , फ़ोन नंबर कुछ भी तो नहीं बताया  उसने ।      

‘ रागिनी   ‘पहेली सी” बनीं हुईं थी मेरे लिए’ ।

                  एक दिन फिर से  सड़क पार करते हुए दो झोले  उठाकर जाती दिखाई दी । मैंने भी गाड़ी सड़क के साथ खड़ी की । 

   भाग कर उसको आवाज़ लगाकर रुकने को बोला ।   “ रुक  तो गई पर- अनचाहे से मन से ही” । 

             रुकने के बाद भी चलना चाह रही थी । पर मैंने हाथ पकड़कर उसको रोक लिया और पूछा- ‘सेहत वग़ैरा ठीक है ना’ ?

      ज्यों ही कामकाज पूछा -    “चलती हूँ , मुझे अब देर हो रही है” । बोलकर , तेज-तेज कदमों से चलने लगी ।

     आगे-आगे साइकिल पर एक आदमी चल रहा था । “जो उसे मुड़-मुड़कर घूरकर  देख रहा था” ।

          अब भी उसने घर का पता नहीं बताया । देखते ही देखते, पता नहीं कहाँ चली गई ।  मेरी आँखें बेचैन होकर उसे ढूंढ रही थी ।

 ‘पता नहीं कौन से घर में गईं होगी’ ? 

         जब भी इधर से निकलती हूँ ,तो बार बार “उसी मोड़ पर” ध्यान जाता है ” ।  

शायद इधर ही आ रही हो, “खुद ही मुझे आवाज़ देकर” रूकने को ही बोल दे  ॥

Comments

  1. Yes want to continue with this story
    Keep it up mam

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  2. With fantastic imagination, Manju's mental power in speculation reaches to infinity where the mind of an ordinary person can not think, she is advised to compile all her passages in the form of hard copies as I think her collection should be considered a legacy & heritage for her coming generation as her memento.

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