स्वार्थ का तमग़ा
रोमा के घर के बाहर लोगों की मिली-जुली बातें सुनने को मिल रही थी । कोई बोल रहा था - “बेचारी रोमा” ।
कोई बोल रहा था- “बहुत स्वार्थी थी” ।बिना काम के कभी उसने बात नहीं की ।
“लोगों की नज़रों में स्वार्थी थी रोमा” । पर सही मायने में हालातों ने उसे बदल दिया था ।
किससे, कब ,किस तरीक़े से बात करनी है । “बहुत ही सोच-समझ कर चलती थी” ।
अगर दिल करता तो,कभी कभी अपनी ज़िंदगी से जुड़ी कुछ बातें बाँट लेती थी ।
“पंद्रह-सोलह साल की उम्र में ही ब्याह हो गया था” उसका । दूर के रिश्तेदार ऐसे ही आये, “उसको पसंद करके अपनाकर चले गये” ।
दिन बीतते देर नहीं लगी । शादी करके कुछ दिनों बाद ही पति के साथ बड़े शहर पैसे कमाने के लिए चली गई ।
“चल पड़ी ज़िंदगी रेलगाड़ी की तरह बिना रूके ही”।
दो बच्चे ,ऊपर से महँगाई ,फिर बड़ा शहर । दिन- रात मेहनत करनी पड़ रही थी । सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक पति की तबियत ख़राब हो गई ।
“अस्पताल में टेस्ट से पता चला कि उसको लाइलाज बीमारी है” ।
देखते ही देखते साल भर के अंदर उनका देहांत हो गया । उसके कुछ रिश्तेदारों ने कुछ दिन तो मदद की । “फिर एक-एक करके सब दूर हो गए” ।
सास-ससुर, जेठ-जेठानी सब थे, “पर सब अपने-अपने घरों में” ।
बेचारी समझकर , सब अपने हिसाब से डालना चाहते थे । उनका रहना सहना और उसके बच्चों की परवरिश तक भी । रोमा ने उनकी कभी नहीं सुनी ।
ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी । “तो नौकरी करना , पति का व्यापार संभालना उसके बस में नहीं था” । इसलिए साझेदारी में काम करना ठीक समझा ।
इतने सालों में इतना तो सीख गई थी । कि “अपना फ़ायदा किसी को उठाने नहीं देना” ।
दोनों बच्चे अच्छे से पढ़ लिख कर नौकरी भी लग गए ।अब उसको ना ही ख़र्चे की चिंता थी ना उनकी शादी की । यही बोलती थी-
“बच्चे लायक हैं ,शादियां भी अपने आप हो जाएंगी” ।
अब तो ज़्यादातर बीमार रहती थी । अचानक अस्पताल में दाख़िल करवाना पड़ जाता था । मिलते ही “फिर भी खुद को स्वस्थ ही बताती”।
हँसी की बात करते ही मोतियों से दांत दिखाकर जोरों से हंसती थी ।फूल के जैसे चेहरा खिल जाता । मुझे तो “एक कहानी जैसी ही लगती थी उसकी ज़िंदगी” ।
बहुत दिनों से उसको आते-जाते नहीं देखा था । उसके बच्चे भी नहीं मिले । फिर एक दिन उसके घर के आंगन में लोगों की भीड़ देखी । कुछ नीचे भी बैठे हुए थे ।
“मुझे एक मिनट भी नहीं लगा समझने में” ।
उसकी बातें, उसका खुल के हँसना , सब कुछ आँखों के आगे घूमने लगा । “एक फ़िल्म के जैसे ही उसकी कहानी भी समाप्त हो गई” ।
अपने बच्चों तक सीमित रहने वाली बेख़ौफ़ रोमा , “स्वार्थी का तमग़ा” लेकर आज संसार से विदा भी हो चुकी थी ।।
Jindhgi ne jina sikha diya
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteIt's nice one
ReplyDeleteExcellent 👍
ReplyDeleteLife is a struggle; Karl Marx would say - relations are economical & based on self-interest, even then some people are benevolent & Social & understand the sorrow & suffering of others, such people are very close to God, even if they may believe in rituals or not.
ReplyDeleteGud one
ReplyDelete