भंडारे वाली गाड़ी


             बड़ी गली के बीच में ही भंडारे वाली गाड़ी खड़ी करवा दी थी । 

           और सब आस-पास वालों को घर-घर जाकर संदेश भी भेज दिया था ।  कुछेक को फ़ोन करके भी  बता दिया था कि “आज भंडारे में ही खाना सब आकर” ।

          रंग-बिरंगी सी क़मीज़ पहनकर छोटा सा बच्चा बार-बार “छुपकर देख रहा था , लाइन लगी या नहीं “। 

    उसे भी तो खाना था वहीं पर जाकर । 

            ज्यों ही लाइन लगनी शुरू हुई “झट से भागकर नंगे पैर ही, सबसे आगे खड़ा हो गया” ।  

       बड़ी सी थाली भी उठा ली हाथ में । जैसे सब बोल रहे थे, वही सब कुछ डलवाता रहा थाली में । “उसकी थाली ही दिख रही थी  डालने वाले को,  वह नहीं” ।

     क्योंकि गाड़ी में ऊपर बैठकर डाल रहे थे । “उसका कद काफ़ी छोटा था” । वह सात-आठ साल का ही होगा ।

        अब जैसे-तैसे  थाली लेकर धीरे-धीरे चलकर सड़क के किनारे ही बैठ गया खाने के लिए । चेहरे की ख़ुशी देखते ही बन रही थी । 

  “इतना ज़्यादा ख़ुश दिख रहा था हलवा पूड़ी देखकर” ।

         मैं दूर खड़ी खड़ी उसे देख रही थी । “साफ़ साफ़ दिख रही थी खाने को देखकर उसकी संतुष्टि” ।  बेफिक्र होकर एक-एक टुकड़ा बड़े चाव से खा रहा था । 

     “बीच-बीच में हँस भी देता था ,आस पास बैठे हुए लोगों को देखकर” ।जैसे आज तो मुँह माँगी मुराद पूरी हो गई हो। 

           भूखे पेट खाना कैसा लगता है इसकी क़दर वही कर सकता है जिसे इसका इंतज़ार हो । “और वह  सच में ही सुबह से भूखा था” । 

     “उसने जानबूझकर  कुछ नहीं खाया था । भंडारे की  गाड़ी इंतज़ार में” । 

         सब की देखा-देखी फिर से खाना डलवाना चाहा  उसने । पर भंडारे वालों ने पूछा -   “खा लोगे  क्या ?  झूठा नहीं छोड़ना, ख़त्म करना पड़ेगा” ।

            हल्के से गर्दन हिला दी और थोड़ा और डलवाकर फिर से सड़क के किनारे ही बैठ गया । खाना ख़त्म करके “थाली वही सड़क के किनारे ही छोड़ दी” । 

   अपने कपड़ों को झाड़ा क्योंकि मिट्टी में बैठ गया था । “और फ़िर  मस्ती से भागता हुआ घर की तरफ़ चल पड़ा” । 

        शायद आज तो सारे  जहाँ की खुशियां , उसने झोली भर बटोर ली थी  । “दोनों हाथों से अपने कुर्ते को पकड़कर हिलाते हुए मस्ती में चल रहा था” ।  

     अब कल जाकर अपने दोस्तों को भी बताएगा कि “हमारी गली में  भंडारे वाली गाड़ी आयी थी” ।

        मुड़-मुड़कर, खड़ा होकर, “भंडारे वाली गाड़ी” को भी देखता जा रहा था ।पेट तो भर गया था लेकिन नियत नहीं  । 

          धीरे-धीरे मुस्कुराकर, मन ही मन उनको  धन्यवाद भी बोल रहा था, अपनी गली में आने के लिए ।।

Comments

  1. The things which we take for granted are so precious for the deprived. Nice story

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  2. Well explained mam hat off to you

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  3. Nice one mam 👌🏾

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  4. Reading your post from day 1you started your blog .you are improving day by day.
    Beautifully written

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