बड़ा समझौता

                   रेणु  घर के आगे वाली सड़क पर  सुबह-शाम बार-बार  चक्कर लगाती रहती थी । इसीलिए  कभी सफ़ाई वाला, कभी कूड़े वाला , “कोई न कोई मिलता ही रहता उन्हें ” ।

   रेणु सबके साथ बोलती थी । हाल-चाल भी पूछती । 

      कोई तीज-त्योहार होता तो “उनको बोलती -  घर से आकर थोड़ा सामान ले जाना”  । 

        सबको रेणु की ,उनके घर की ,पहचान हो गई थी । “ कई दिन नहीं दिखती तो गली के गार्ड से पूछते उनके बारे में” । एक बार हमें भी मिले चलते-चलते । 

       मैंने उनसे पूछा -   कैसे समय व्यतीत करते हो । उनको  शब्द नहीं मिले, खुलकर बताने के लिए  ।

   “बस समझाना चाह रही थी कि अकेली नहीं हूँ” । 

             “काम वाली के साथ सारा दिन घर में ही रहती हूँ” । और एक कमरे में उनके साथ उनके  “माँ बाप और गुरु जी रहते हैं” । 

        फिर बोली —   उनके साथ समय  कब निकल जाता है । पता ही नहीं चलता  । यह  बताकर धीरे-धीरे गेट खोलकर अंदर चली गई ।

      और मैं , “उसी जगह खड़ी  सोचती ही रह गई” ।

     “माँ बाप को इस दुनिया से गुज़रे भी अरसा हो गया है,  तो फिर कैसे” ?

               और गुरुजी  वो तो उनके आश्रम  में ही रहते होंगे । यहाँ कैसे आ कर रहेंगे । 

    “मन विचलित हो गया उनकी बातें सुनकर” ।

        दूसरी तरफ़ उनका अटूट विश्वास ,जो उनके साथ रहने का एहसास दिखा रहा था । ऐसा लगा जैसे उन्हें “अपनी इस ज़िंदगी से,  कोई गिला-शिकवा भी नहीं है  ।

        चार-पाँच साल पहले अचानक ही पति का देहांत हो गया । उसके बाद से ही वह अकेली ही रह रही थी ।

          उनके बेटा-बेटी विदेश में रहते है । “यहाँ थे भी तो थोड़े से रिश्तेदार , जो कभी कभी फ़ोन कर लेते थे” । पर समय किसी के पास  नहीं था । 

     “ना ही मिलने का ,ना ही  उन्हें अपने पास बुलाने का” ।

            बच्चों ने बहुत कोशिश की रेणु को अपने साथ ले जाने की । पर मुमकिन न हो सका ।

  “ चार-छह महीने से ज़्यादा ,नहीं रह सकती थी उनके पास” । 

          इसलिए यहाँ अकेली ही रह रही थी । पर बीच-बीच में विदेश, दो-चार महीने रहने जाती थी । “लेकिन वापिस फिर भी यहीं आना पड़ता था” ।

              एक दिन, पेड़ के नीचे  बैठने वाले चाय वाले ने, बताया — वह कोने के घर वाले आंटी थी ना ,”अपने शहर वापिस सामान लेकर चली गई” ।  

   अपने इस घर को किराये पर दे दिया । 

       मैंने कहा --  “ अच्छा ही हुआ” । कम से कम ,  रिश्तेदार और जान पहचान के  लोग सब  मिल तो जाएंगे । 

               उनके  गेट पर लगे ताले को देखकर, यही सोच रही थी ।  बच्चों को भविष्य बनाने के लिए  विदेश तो भेज दिया ।

    “थोड़ा सा खुद के लिए भी सोच लिया होता तो आज ताला नहीं लगा होता” ।

         हमेशा हमेशा के लिए अपनी ज़िंदगी से इतना “बड़ा समझौता”, कर  लिया ।।

             

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