और कोई रास्ता भी तो नहीं था
मंदिर के बाहर सुबह से ही भीड़ थी । “गेट पर ही बहुत सारे स्टॉल लगे हुए थे” । किसी पर पुस्तक रखी हुई थी तो किसी पर मंदिर सजाने वाला सामान ।
“लोग लाइन बना-बनाकर देखते हुए चल रहे थे” ।
ख़रीदने वाले भी बहुत लोग थे और देखकर आगे निकलने वाले भी बहुत ।
“भीड़ में ही एक बुज़ुर्ग भी धीरे धीरे चल रहा था” ।
कोई उनसे आगे निकल जाता तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनको । “कोई उनको पीछे सरका देता , तो भी कोई फ़र्क नहीं” ।
वह अपने हिसाब से ही देखते जा रहे थे । बस मंदिर के बड़े पुजारी का इंतज़ार कर रहे थे ।
“इंतज़ार के चक्कर में दो-तीन बार स्टॉलों के आगे से निकल चुके थे” ।
कोई ख़ाली कुर्सी भी तो नहीं दिख रही थी । थोड़ी देर बैठ ही जाते । “ज़मीन पर बैठ गए तो , मंदिर के कर्मचारी उठाकर बाहर निकाल देंगे” ।
तभी मंदिर के बड़े पुजारी अंदर आ गए ।
पुजारी को देखकर बुज़ुर्ग की आंखें चमक गई । इन्तज़ार जो ख़त्म हो गया था उनका । “अब आरती होगी, फिर भगवान को भोग लगेगा” ।
“पैसे वाले लोग , बिना लाइनों के मंदिर में दर्शन करेंगे” ।
और दूसरे लोग लाइन में लगेंगे ।
पर उसे तो इन बातों से कोई लेना-देना नहीं था । “उसे तो बस इंतज़ार था प्रसाद का” । जो मंदिर के पुजारी के आदेश पर ही शुरू होगा ।
“तभी उसने अपनी जेब में मूडी-तूडी थैली संभाली” । कहीं झोपड़ी में तो नहीं भूल आया ।
आरती शुरू हो गई । पुजारी ने ज़ोर से शंखनाद किया । “ज़ोरों से घंटियाँ बजनी शुरू हो गई” ।आरती होने तक सब हाथ जोड़कर खड़े रहे ।
फिर पुजारी ने प्रसाद बाँटने का आदेश दिया । यह सुनकर उसकी ख़ुशी देखते ही बन रही थी ।
“प्रसाद वितरण शुरू कर दिया” । कुछ लोग सबको लाइन बनाने का आग्रह कर रहे थे ।
“वह तो लाइन में सबसे पहले ही जाकर खड़ा हो गया” ।
मन ही मन ख़ुश था । सबसे आगे वाले को ज़्यादा देते हैं । “ख़त्म होते-होते थोड़ा-थोड़ा देना शुरू कर देते है” ।
हाथों में प्रसाद लेने के बाद, अपनी थैली भी खोलकर आगे कर दी । “बच्चों का नाम लेकर” ।
प्रसाद को अच्छे से थैली में डाला । फिर जाकर मंदिर के गेट के बाहर ही पेड़ के नीचे बैठकर खाया । “घर तो कोई नहीं था, ना ही बच्चे ना कोई और” । झूठ बोलकर खाना ले लिया
“बहुत सालों से अकेला ही रह रहा था” । उसे तो कुछ याद भी नहीं था ।
झूठ बोलकर ही सही , “पर पेट की भूख तो ख़त्म हो गई” । अब कहीं और खड़ा नहीं होना पड़ेगा । रात को अच्छी नींद आ जाएगी ।
“आज का काम तो चल गया” ।
खाने से ख़राब हुई पॉलीथिन को सड़क के किनारे ही फेंक दिया । और फिर मंदिर के गेट के आगे जाकर खड़ा हो गया ।
“अपने हाथों को कपड़ों पर, रगड़कर साफ़ किया” ।
फिर सिर झुकाकर भगवान से माफ़ी माँगी । भगवान —माफ़ कर देना । “और कोई रास्ता भी तो नहीं था” ।
इस उम्र में ना कोई काम देता है । ना ही पेट भरने को खाना । सोचता हुआ , धीरे-धीरे झोपड़ी की ओर चल दिया ।।
Heart touching story
ReplyDeleteNo words mam amazing story
ReplyDeleteअति उत्तम
ReplyDeleteNicely written
ReplyDeleteBeautifully written
ReplyDeleteWell expplained
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