सच में बाप बन गया


              “जगत” रमेश की इकलौती औलाद था । “उसे जगता ही बोलते थे” सारे  परिवार वाले  । 

              पढ़ा-लिखा नहीं था जगता  । “स्कूल ख़त्म होने तक उसकी माँ  गेट के बाहर बैठी रहती थी” ।  

        कभी स्कूल से बाहर न भाग जाएं ।  “कोशिश तो बहुत की माँ-बाप ने” पर नहीं पढ़ा ।

                  गांवों में  “ख़ाली बैठकर, नशेड़ी बन रहे थे गाँव के जवान बच्चे” ।  पर वक़्त रहते , रमेश ने तो उसे अपने काम धंधे में साथ ही लगा लिया ।

          “हर बुरी संगत से बचाकर चल रहे थे” । इसीलिये  उसकी जल्द ही शादी भी कर दी  । 

      “ताकि घर- परिवार में व्यस्त हो जाए” । 

              परिवार में जल्द ही  एक नन्ही-सी जान भी आ गई । उसकी किलकारियों से घर भी चहकता रहता था ।

              “कभी कंधे पर बिठाकर , तो कभी साइकिल के डंडे पर” ।  मोहल्ले भर में घुमाता रहता था बच्ची को । 

                उसे तो इसी बात की ख़ुशी थी कि वह भी पापा बन गया ।   “बेटी के आते जगत ख़ुद को भी बड़ा समझने लग गया था” । 

      सब कुछ बहुत ही अच्छा चल रहा था ।

             एक दिन गाँव में आपसी भाईचारे में झड़प शुरू हो गई । देखते-देखते जगत भी  लड़कों के साथ शामिल हो गया ।  ईटे उठाकर एक दूसरे को मारने लगे । 

      “जगत ने बहुत कोशिश की परिवार का कोई सदस्य घर से बाहर न आये” ।

           पर रमेश फिर भी बेटे को बचाने और उस भीड़ से निकालने के लिए पहुँच गया ।  “अचानक किसी ने ईंट ज़ोरों से जगत के ऊपर फेंक दी” । 

        बेटे को बचाने के चक्कर में, ईट रमेश के माथे पर ज़ोरों से जा लगी ।

           एक मिनट भी नहीं लगा उसको  बेहोश होकर गिरने  में । देखते- देखते  शोर रुक गया ।  हर कोई जगत के पिता को हिलाये जा रहा था ।

    “साँसें तो चल रही है , बच तो जाएगा ही” ।

             पिता को देखकर जगत का बुरा हाल हो चुका था । हिम्मत करके उसको कार में बिठाया और “सरकारी अस्पताल की तरफ़ गाड़ी मोड ली” । 

      वहाँ तक पहुँचते पहुँचते थोड़ा होश आ गया था रमेश को ।

                “चैन की साँस ली जगता ने भी” । फिर भी रो ही  रहा था । फिर तो रमेश भी, जगता को रोते देखकर रोने लगा । 

            जगता अपने पिता को  डाँटकर समझाने लगा — “ऐसे कभी बीच में नहीं आना ।  पर रमेश जगत को डाँटने लगा ” —आगे से कभी ऐसे झगड़ों में नहीं फँसना ।

       “अब तू भी एक बच्चे का पिता बना चुका है” अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझना शुरू कर दो ।

         “जगता भी आज बहुत बड़ा सबक़ लेकर घर जा रहा था” । अपने पिता रमेश को बोला —आज समझ में आ गया ।

          अब  मैंने इन लड़ाई झगड़ों से दूर रह कर,  “अपना काम धंधा और अपने परिवार को ही संभालना है  ” ।

     “रमेश भी जगता की बातें सुनकर बहुत ख़ुश था ” ।

            घर पहुँचकर, पोती को गोद में लेकर रमेश बोला — “आज तेरा बाप सच में बाप  बन गया”। हमारा ज़िम्मेदार जगता ।।

Comments

  1. Beautifully written mam 👌👌

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  2. Practical life & responsibility teach a lesson, one can understand the feelings & sentiments of a father when he becomes a father, responsibilities & obligations make him perfect & sincere, however, few people give importance to their responsibility.

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