रेहड़ी की बोहनी
एक दिन सैर करते हुए पब्लिक पार्क की तरफ ही चल दिये । पार्क के पीछे वाले गेट पर सब्ज़ियों की काफ़ी रेहडियां खड़ी थी ।
“सब्ज़ी भी ले ही लेते हैं, सोचकर फिर उधर ही मुड़ गए ” ।
उन सब्ज़ी वालों में से कुछ ग्राहक का इंतज़ार कर रहे थे । “कुछ चादर तानकर बैंच पर सो भी रहे थे” । लेकिन सब्ज़ी पर पानी डालकर बोरी तो सभी ने ढकी हुई थी ।
“एक वृद्ध सब्जीवाला बार-बार बोरी उठाकर सब्ज़ी देखे जा रहा था” । फिर सबको सलीक़े से लगाने की कोशिश करता । फिर से ढक कर, इधर-उधर नज़र मारने लगता ।
“आगे पीछे दोनों गलियों पर नज़र थी उसकी ।
बहुत दिनों के बाद मौसम खुला है । हर-रोज़ ही तेज़ बारिश चल रही थी । “और वह तो दो दिन के बाद आज ही सब्ज़ियाँ लेकर आया था ” ।
शायद सब्ज़ी भी ज़्यादा ही ख़रीद ली । अब पता नहीं , बिकेगी भी या नहीं । “उसकी चिंता उसके चेहरे पर भी साफ़-साफ़ दिखाई दे रही थी” ।
“मैंने दूर से ही भाँप लिया था उसकी बेचैनी को” । जिस तरह वह रेहडी के दोनों तरफ़ घूम रहा था ।
ज्यों ही मैंने उसकी रेहड़ी की तरफ़ कदम बढ़ाया । उसने “तराजू को हाथ लगाना शुरू कर दिया” ।
आख़िर इतने इंतज़ार के बाद कोई ग्राहक आ रहा है । मेरे पास जाते ही झट से आगे आकर बोला — जी , क्या क्या दिखाऊ साहब जी ।
“सारी सब्ज़ी है । वो भी बिलकुल ताज़ी” ।
और बोरी उठाकर एक तरफ़ रख दी । एक सब्ज़ी के लिए पूछा ही था , “तभी बोला — हाँ जी साहब, सबके ही बता देता हूँ “।
फिर हँसते हुए बोला— किसी रेहडी पर नहीं मिलेंगी इतनी बढ़िया सब्ज़ियाँ ।
मैंने भी उसे दो -तीन सब्ज़ी तोलने को बोल दिया । “उसके बाद दूसरी भी दिखाने लगा — यह भी देखो” ।
बिलकुल ख़राब नहीं होगीं । फ्रिज में सप्ताह भर बाद भी ऐसे ही रहेंगी । ले जाइए ।
“उसके ज़ोर डालने पर, मैंने एक और तोलने के लिए बोल दिया” ।
पैसे देकर चलने ही वाला था । तभी उसने रोका साहब जी,साहब जी — आज आपने ही बोहनी करवाई है मेरी । “अच्छा दिन शुरू करवा दिया” ।
“आपको यह सब्ज़ी तोहफ़े में देता हूँ । कोई पैसा नहीं देना है इसका” ।
यह बोलकर एक कद्दू लिफ़ाफ़े में डालकर दे दिया । मैंने मना किया —नहीं लेना । “मेरी तरफ़ से बेच देना इसको और पैसे तुम रख लेना” ।
पर वह नहीं माना और “पैर ही पकड़ने लगा” । फिर मैंने भी ज़्यादा बहस ना करके अपने झोले में डाल लिया ।
ज्यों ही चलने लगा फिर से बोला — “मुझे लगा अब पता नहीं क्या देने लग जाये” । मै बिना रूके चल पड़ा ।
फिर भागकर आगे आ गया और बोला — “रेहडी की बोहनी करवाने के लिए शुक्रिया साहब जी” । अब उसके चेहरे पर चिंता समाप्त हो चुकी थी ।
अच्छा लगा देखकर । “मेरे मुस्कुराते ही वह भी हँसने लगा” ।
फिर वापस जाकर, “कोई लोकगीत जिसमें बोहनी का ज़िक्र था” , गुनगुनाने लगा । और सब्ज़ियों को जँचाने में व्यस्त हो गया ।।
Shi me
ReplyDeleteVery thoughtful story
ReplyDeleteIt’s great Mam
ReplyDeleteWell written mam 👌
ReplyDeleteWell written
ReplyDeleteWell written
ReplyDelete