कोथली देखने ज़रूर आना


                   दादी हर रोज़ नहा-धोकर बाहर दरवाज़े पर ही खाट  बिछाकर बैठ जाती थी । “आते-जाते लोगों को देखती रहती” । 

      पर अब कुछ दिनों से वह बेचैन सी टहल रही थी ।

                “कभी चारपाई पर बैठ जाती, तो कभी डण्डे को पकड़कर, सड़क तक जाकर  फिर से वापस लौट आती” ।

            फिर बैठकर इधर-उधर देखने लग जाती । “दो-तीन दिन तो मैं भी सब देखती रही” । 

            एक दिन लगा कि पूछ ही  लेती हूँ । “आख़िर बात क्या है ?  जो इतना परेशान रहने लगे हैं” ।थोड़ा समय निकालकर उनके पास जा पहुँची ।  “उनकी परेशानी  जानने के लिए” ।

             ज्यों ही उनके पास पहुँची । नमस्ते लेते ही उन्होंने स्वयं ही अपनी परेशानी बतानी शुरू कर दी ।

        “मेरे लिए तो बहुत बढ़ी नहीं थी लेकिन उनके लिए  बहुत बड़ी परेशानी बन चुकी थी” । 

                वैसे तो सरोज  ‘लगभग 85 साल’  की हो चुकी थी ।  “उनकी सेहत भी  बहुत अच्छी थी” ।

              भरा-पुरा परिवार था उनका ।  “पोते पोतियाँ तक    की शादी हो चुकी थी” । घर भी सुख सुविधा संपन्न था ।

             सावन के महीने में  बहूँ बेटियों को मिठाइयाँ ,कपड़े वग़ैरह सावन के उपहार के तौर पर भेजे जाते हैं । “भारत में काफ़ी राज्यों में रिवाज़ है यह” । 

          सरोज के ज़िले मे  “कोथली बोलते है  सावन के उपहार को” । मीठे मे घेवर तो ज़रूर देते हैं ।

            सरोज ने भी बेटियों का भिजवा दिया और उनकी बहू के घर से भी आ गया । “बस उसका ही रह गया” ।

               सोते जागते उनके दिमाग़ में यही सब चलता रहता “लेट क्यों हो रहे है ।,देने क्यों नहीं आये अब तक” । अगर भतीजे को समय नहीं है तो भाई-भाभी ही आ जाते । 

      ख़ुद ही उलझी हुई थी ।  इसीलिये  परेशान थी ।    

                “उनको लग रहा था कि इसमें उनकी इज़्ज़त कम हो रही है  कि उनके घर से ‘कोथली’ देने नहीं आये  अब तक” ।

              फिर मैंने उनको बोला —फ़ोन करके पूछ लेते हैं  दादी ।  अपना फ़ोन दो ।  

       “अभी आपकी  परेशानी ख़त्म कर देते है” ।  

                 आप शांत होकर बैठ जाओ । मैंने उनके फ़ोन से ही फ़ोन मिला लिया । “मगर  दादी ने फ़ोन मिलते राज़ी-ख़ुशी भी नहीं पूछी” । 

             फ़ोन हाथ में लेते ही अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की ।  “क्यों नहीं आये अब तक  ?  मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ” ।  

    धीरे-धीरे ही सही लेकिन जो मन में था सब बोल दिया ।

              पर थोड़ी देर में ही अपनी भाभी से बातचीत करने के बाद बहुत संतुष्ट थी । “उन्होने बोल जो दिया —आज कल में आ रहे हैं ” । चिंता ना करो ।

              दादी  अब खुश लग रही थी । “अब उनके चेहरे से परेशानी ग़ायब हो गई थी” । फ़ोन रखते ही उन्होंने  सब  बातें बतानी शुरू कर दी । 

     “जो-जो उनकी भाभी से,  उनकी बात हुई” ।

               दो-तीन दिनों से जो परेशानी लेकर घूम रही थी ,”वह दो  मिनट के अंदर ही ख़त्म हो गयी” । मैं उन्हें देख हैरान थी।

    “इस उम्र में भी  सावन के उपहार,  यानी कोथली का इतना इंतज़ार” ।  

                 अब तो उनको देखकर लग रहा था कि फ़ोन से ही जब इन को इतनी ख़ुशी मिल गई ।   “जब  वह लोग सचमुच में देने आएंगे तो ,  ‘इनकी तो उम्र ही बढ़ जाएगी” । 

               अब भी वो हँसते हुए ही बातें बताये जा रही थी “अपने पीहर की” ।  मैं उनको बाद में मिलते है बोलकर —अपने घर की तरफ़ चल पड़ी ।   

                 “ फिर मुझे ज़ोर से आवाज़ लगाते हुए हँसते हुए बोली —‘मेरी कोथली देखने ज़रूर आना”  ।।

Comments

  1. Well explained Mam
    It's wonderful

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  2. Bhut hi sunder👍🏻

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  3. Full of emotions and love for mayka

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  4. Kothli is the only medium but it is feeling & emotional attachment with the family which causes homesickness & missing the family & it is a spiritual bonding & ever lasts till death. Ladies have such qualities by nature & instinctively. Manju's description of the topic is realistic & sensitive & has been textured very nicely.

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