ख़ाली टिफ़िन


                     पवन ने एक हाथ में छतरी ,  दूसरे हाथ से साइकिल पकड़ रखी थी । “फिर टिफ़िन को भी साइकिल के हैंडल पर ही लटका लिया” ।

      “पर बारिश तो और तेज होती जा रही थी” । 

               खेत के बीचों-बीच जो राही बनी हुई थी ,वह भी पानी से भर गई थी ।  बहुत देख-देखकर पैर रखना पड रहा था। “फिर भी  मिट्टी में पैर धँसा जा रहा था”  ।

        वह जल्दी जल्दी पैर उठाकर चलने की कोशिश कर रहा था क्योंकि उसकी बस छूट सकती थी ।

              “गड्ढों से बच-बचकर निकल रहा था” । ख़ुद को भी संभाल रहा था और साइकिल को भी । “अचानक ही मिट्टी में पैर धँसने से  संतुलन  बिगड़ गया”  । 

      पैर भी मुड़ गया और हाथ से साइकिल भी गिर गई । 

      “साथ में रखा हुआ टिफ़िन भी पानी में जा गिरा” ।

     एक मिनट में ही सब उलट-पुलट हो गया ।

                 टिफ़िन खुलकर खाना बारिश के पानी में गिर गया । “लगता है आज जल्दबाज़ी में टिफ़िन को अच्छे से बंद नहीं किया होगा” । 

     अब भी खाने से  इतनी  ख़ुशबू आ रही थी ।

                 “फिर टिफ़िन छोड़ साइकिल उठानी चाही, तो छतरी हाथ से छूट गई” ।  और देखते ही देखते हवा के साथ बहुत दूर तक उड़कर झाड़ियों में अटक गई ।

                  “तभी उसे माँ की बात याद आयी — सब्र रखा कर” । दिमाग़ को शांत रखकर काम किया कर । उसे अब तो सच में ही  कुछ समझ नहीं आ रहा था ।

     “अब क्या करें । पहले क्या सँभाले” ।

                 फिर पहले साइकिल को खड़ा कर लिया ।  “फिर अपनी छतरी को देखने लगा, जो लगभग फट्टने वाली थी” ।   

      थोड़ी देर वहीं पे खड़ा होकर अपने मन को शांत किया ।

                 टिफ़िन का  खाना तो सारा ख़राब ही हो गया था । “सब उठाकर  मिट्टी के मुँडेर पर ही रख दिया , कोई जानवर ही आकर ख़ा लेगा” ।

     “ख़ाली टिफ़िन साइकिल के डंडे पर लटका लिया” । 

                फिर  मन में सब सोचकर  , अपने ही ऊपर ज़ोरों से हँसने लगा । कभी छतरी को देखकर तो कभी ख़ाली टिफ़िन को।  

           “पीछे आ रहे लोग भी उसे हँसता हुआ देखकर- हंसने लगे” । सबने मिलकर उसकी मदद की । उसकी छतरी झाड़ियों से निकालकर कर भी दी ।

    “जो बुरी तरह फट  गई थी” ।

             सब कुछ समेट कर उसने घड़ी में समय देखा । बस तो पहुँचने ही वाली थी । जल्दी से जल्दी खेतों से निकलकर सड़क पर पहुँचना था उसे । 

              “सड़क पर पहुँचते ही  तेज़ी से पैडल मारकर  साइकिल भगा ली” ।  तभी बस आती हुई दिखाई दी । 

                “भाग कर साइकिल पेड़ के साथ  ताला लगाकर खड़ी कर दी । और बस पकड़ ली” । 

             “अड्डे के पास पहुँचते ही बस ड्राइवर ने आवाज़ लगायी - थोड़ी देर में ही बस रुकने वाली है।”  लेकिन पवन तो पहले से ही सचेत था ।

   “अब और गलती नहीं” । पवन  सबसे पहले ही उठ गया । 

                बस के रूकते  अपने ‘ख़ाली टिफ़िन’  को मुस्कुराकर  उठाया । “ख़ुद को तसल्ली देते हुए अपने आपको बोला —  कोई बात नहीं” ।

     “आज फ़ैक्ट्री के पास वाले गुरूद्वारे में खा लेंगें” । 

       फिर मुस्कुराते हुए अपनी फ़ैक्ट्री की तरफ़ चल पड़ा ।।


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