वीजा की मोहर


                    थके-हारें भारी बैग लेकर सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे । “उत्साहित इतने कि कब सीढ़ियाँ ख़त्म हो गई ध्यान ही नहीं गया”। 

          बहुत सारा सामान ख़रीद कर लाये थे ।  बहू-बेटा और पोता-पोती के लिए । 

              अभी तो सामान लगाना भी है —बैठकर दोनों एक-दूसरे को बोल रहे थे । “सब याद से रखना , कभी यही ना भूल जाएं” । 

    पासपोर्ट आगे मेज पर रख लो ।

    चाय का कप हाथ में लेकर,  ऐसे ही बातें करने लगे । 

          कब से बच्चों के पास जाने का  इंतज़ार कर रहे थे । “अब मौक़ा मिला है जाने का” ।

      बच्चों के साथ बहुत मस्ती करेंगे बच्चे बनकर ।   “क्या बच्चे भी हमें देखकर इतने ही ख़ुश होंगे”  ? दिमाग़ भी पता नहीं क्या क्या सोच रहा था ।            

                 कर्फ़्यू के  समय बहुत बुरे हालातों से गुज़रे थे । “समय पर संभालने वाला कोई भी नहीं था” ।  

          बेटे  साथ रहते तो,  कम से कम देखभाल तो हो सकती ।  बहुत बार सोचते रहते थे ये सब ।  पर जब दिन निकल गए । तो सब पहले की तरह फिर से सामान्य चलने लगा ।

              फिर एक ही बात  दिमाग़ में आने लगी । “अच्छे से रहे जहाँ भी रहे ,  चाहे दूरी कितनी भी हो” । 

              उनकी तो अभी सारी उम्र पड़ी है, तरक़्क़ी करने के लिए । “अपने-अपने परिवार को संभाल लें वही बहुत है”। 

            आज तक भी ज़मीन दुबारा नहीं ख़रीदी गई । उनको पढ़ाने लिखाने , शादी ब्याह के लिए सब बेचना  पड़ा । 

      “ कभी कभी इस बारे जब उनसे बात होती है”  तो बस छोटा सा वाक्य सुना देते हैं । 

   “ये तो आपका  फ़र्ज़ था” । 

         इतना तो माँ बाप करते ही हैं ।  “हम भी करेंगे , जब हमारे बच्चों को ऐसी ज़रूरत होगी” ।

                  कभी कभी लगता है कि यह सारे फ़र्ज़ हमारे ही थे । उनके क्या कभी होंगे ही नहीं हमारे लिए ।

           “ क्या  उनका दिल नहीं करता होगा” । हम भी माँ बाप के साथ रहे जाकर ।  या अपने माँ बाप को अपने पास ले आये यहीं पर हमेशा के लिए ।

    “एक साथ रहने के लिए” ।

               तभी दरवाज़े की घंटी बजी । “शायद दो -तीन बार बज चुकी  थी” । पर विचारों में इतना डूबे हुए थे कि सुनाई ही नहीं दी । 

            दरवाज़ा खोलकर देखा तो सूरज— घर का नौकर आया हुआ था । बस फिर  उसको  सारे घर का काम वग़ैरह समझाने लगे ।

       “जब भी जाओ सब देखकर ,  ताला लगाकर ही जाना” । 

         और भी  पता नहीं क्या क्या समझाया । “ नौकर के जाते ही फिर से सूटकेस के पास बैठकर, दोनों अपना सामान चेक करने लगे” । 

     चलो भूल जाओ सब पुराना , अब बस जाने की सोचते हैं ।

             सबसे पहले पासपोर्ट खोलकर  चेक किया ।  “वीज़ा लगा तो हुआ है ना” । कोई गलती तो नहीं हुई । 

          “फिर दोनों एक दूसरे को देखकर हँसने लगे” । बच्चों की तरह ही  उत्साहित थे दोनों । जल्दी से जल्दी जाने के लिए ।

  “अब जाकर इंतज़ार ख़त्म होगा” ।

     फिर  दोनों एक दूसरे को सलाह देने लगे । 

    सुबह समय पर एयरपोर्ट भी पहुँचना है ।अब सो जाते हैं ।     

            फिर से,  मुस्कुराकर पासपोर्ट पर लगी  “वीज़ा की मोहर”  को देखा और लाइट बंद कर दी। नींद तो नहीं आनी थी बस दिन निकलने का इंतज़ार करने लगे ॥

    

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