उसकी हड़बड़ाहट
मेहमान भी बहुत थे ,पर सब चुपचाप । बार बार समय देख रहे थे, जैसे वक़्त बीतने का इंतज़ार कर रहे हो ।
“लेकिन नितिन के चेहरे पर बेचैनी झलक रही थी” । सब कुछ जल्दी- जल्दी निपटाना चाहता था ।
सारी रस्मे, सब रिवाज़ । बिना बैठे, एक घंटे तक करने को कह दिया रिश्तेदारों को । “कृपया करके बैठे नहीं ,सब निपटाना है जल्दी जल्दी” ।
ख़ुद भी तूफ़ान की तरह ही तो घूम रहा था ।
कंधे पर बैग भी टाँग रखा था । “शायद ज़रूरी सामान होगा जो, कहीं रखना भी नहीं चाहता था” । उसकी हड़बड़ाहट सबको बेचैन कर रही थी ।
तभी किसी ने उसको जाकर पूछा — क्या हुआ नितिन , कोई परेशानी है क्या ? “लड़का-लड़की तो शादी के लिए तैयार है ना । कोई मदद चाहिए क्या” ।
नितिन ने आत्मविश्वास से बोला —नहीं ऐसा कुछ नहीं है बस समय से निपट जाए । समय की कमी ही है थोड़ी ।
“बार-बार गेट की तरफ़ भी देख रहा था” । जैसे किसी का इंतज़ार हो ।
सबके लिए पहेली ही बन गया था आज का दिन । सब धीरे- धीरे आपस में फुसफुसा रहे थे ।
एक-एक रस्म होती चली गई । “साथ में नितिन भी सहज नज़र आने लगा जैसे कोई बोझ उतरता जा रहा हो”। फेरे भी होने ही वाले थे । पंडित जी बैठ चुके थे ।
नितिन ने खुद को सांत्वना दी । “अब तो विवाह संपन्न ही समझो” ।
नितिन बीच में उठकर फिर से गेट की तरफ़ देखकर आया । “आते ही बोला — पंडित जी जल्दी करो”, शुभ मुहूर्त भी निकल रहा है ।
वर -वधू सबका आशीर्वाद लेकर फेरों के लिए बैठ गए। “जल्दी ही मंत्रोच्चारण होकर फेरे भी सम्पन्न हो गए” ।
कुछेक रिश्तेदारों ने तो धीरे-धीरे जाना भी शुरू कर दिया ।
“नितिन अब विदाई की जल्दबाज़ी करने लगा ।बस एक ही काम रह गया, वह भी अच्छे से निपट जाए” ।
नितिन ने ज्यों ही मुड़कर गेट की तरफ़ देखा तो कोमल रोते-रोते यहीं आ रही थी । “आते ही बोलने लगी —इतना बेगाना कर दिया आपने” ।
मेरी बहन की शादी और मुझे बुलाया तक नहीं ।
“मुझे तो पड़ोस वाले चाचा ने बताया —आज तो तुम्हारी बहन की शादी है” । तुम अब तक घर पर ही हो ।
“ फिर वहीं बैठ कर रोने लगी” ।
रोते हुए बोली— “ओहो मुझे तो याद ही नहीं रहा । आपने तो मेरे साथ सब रिश्ते नाते तोड़ रखे हैं” । आपको तो बहुत बुरा लगा होगा कि मैं यहाँ कैसे आ गई ।
“कभी मैं अपनी ही बहन को बद्दुआ ना दे दूँ” । उसकी नई ज़िंदगी में कोई अड़चन पैदा ना कर दूँ ।
नितिन ने उसे गेट पर ही रोक दिया । “आज नहीं कोमल एक बार विवाह संपन्न हो जाने दे” । उसके बाद जितनी चाहे खरी-खोटी सुना लेना ।
कोमल जब भी तीज-त्योहार पर आती घर में, हमेशा झगड़ा करके ही जाती थी । कभी भी खुश नहीं गई ।
“कोमल का क्या क़सूर होगा ? जो उसे भनक भी नहीं लगने दी” । सबके चेहरों पर एक यही सवाल था ।
लेकिन नितिन अब हड़बड़ाहट में नहीं था । शादी भी संपन्न हो गई और “जिस मुसीबत का उसे डर था, वह आयी और टल भी गई” ।
“ कोमल चुपचाप घर वापिस जा चुकी थी ।बिना कुछ बोले -सुने” रोते हुए ।
विदाई भी अच्छे तरीक़े से हो गई । ‘मेहमान भी एक-एक करके अपने अपने घर चले गए , लेकिन मन में बहुत सारे सवाल लेकर ।
नितिन अब पैरों को कुर्सी पर रख कर आराम से बैठ गया । “घर के हालात भी ढके रह गए” और शादी भी अच्छे से निपट गई ।
“उसकी हड़बड़ाहट” अब सुकून में तब्दील हो चुकी थी ॥
Very nice
ReplyDeleteWell explained mam 👌👌
ReplyDeleteGreat
ReplyDeleteExcellent 👍
ReplyDeleteWell written
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