जी तो लूँ

                   उसे अब भी बहुत चाव था  सजने सँवरने का, “बिलकुल पहले की ही तरह” ।  बार-बार सीसा  देखकर कपड़े- बाल ठीक करती रहती थी ।

    “फिर हंसकर बोलती— कुछ ज़्यादा तो नहीं लग रहा”  ।

                    बस बाल थोड़े सफ़ेद हो गए है । कमज़ोरी से चेहरे पर लाइन दिख रही है । पर ये तो,  उम्र के हिसाब से होता ही है ।

       यह तो बड़ी बात नहीं है ‘सबके साथ ही होता है’ ।

      “बीमारी को अपने ऊपर हावी तो नहीं होने दूंगी , चाहे कुछ भी हो जाए” ।

                   ‘आगे तो जितने साँस भगवान ने देने है  उतने तो रहेंगे ही’ ।  वो  तो कहीं जाने से रहे ।

      फिर हँसते हुए कहती—“जब तक ज़िंदा हूँ, तब तक  जी तो लूँ” ।

                शीला ख़ुद को ही तसल्ली देती रहती थी ।” ऐसा हर रोज़ एक बार तो पक्का ही दोहरातीं” । अभी कुछ ही समय पहले शादी में मिली थी ।

                 दो- तीन दिन साथ ही रहे । “कोई कमी नहीं होने दी पहनने-ओढ़ने में । किसी से कम नहीं लगनी चाहिए” । यह सोचकर सारे कपड़े, सब चटक रंग, कढ़ाई वाले ।

      सब अच्छे से तह करके लेकर आई थी ।

    “ दवाइयों का एक पैकेट भी साथ लेकर चलती रही” ।

                    समय पर लेने के लिए फ़ोन देखती रहती थी ।  कोई भी दवाई नहीं छूटने दी । समय से 5 मिनट पहले ही पानी लेकर दवाई लेने के लिए बैठ जाती थी ।

         “ एक अन्दरूनी हिम्मत  थी उसमें । जो उसके  चेहरे पर भी झलकती  थी” ।

        किसी के रोकने-टोकने का  कोई बुरा नहीं माना । “पर हमेशा अपने मन का ही किया । किसी की नहीं मानीं” ।

                 तभी उनको  जगह तलाश करते देखा। “मैंने पूछ ही लिया —क्या कोई परेशानी है” ? कुछ मदद करूँ आपकी ।

                  फिर थोड़ा लंबा-सा साँस लेकर बोलीं — “थोड़ा आराम हो जाता तो अगला प्रोग्राम अच्छे से देख लेती” ।

    हमने कहा- यहीं लेट जाओ । 

     “अभी सोफ़ा पर जगह बना देते हैं आपके लिए” ।

                  शीला भी इंतज़ार ही कर रही थी । सामान  समेटते  ही वहीं लेट गई ।  सब उनको लेकर बात कर रहे थे ।  

  “उनकी बीमारी की ,  गिरती सेहत की” ।

                एक रिश्तेदार ने तो बोल ही दिया— “क्या ज़रूरत है ,हर प्रोग्राम में भागने की आराम से बैठो” ।

                इतना सुनते ही उनकी आंखें नम हो गई । “बोलती — वही पहली वाली ही हूँ मैं , बीमार हूँ तो क्या हुआ” । 

     मैं नहीं समझती ख़ुद को लाचार बीमार ।

                  “अगर अकेले बैठी रह  गई तो ज़रूर बीमार हो जाऊँगी , मुझे रोको मत” । जब मुझे लगेगा हिम्मत ख़त्म हो गई तो अपने आप रुक जाऊँगी ।

       “बार-बार मुझे टोकेंगे तो  मुझे लगेगा कि मैं वाक़ई में बहुत बीमार हूँ “।

                       फिर हमें भी लगा उनके अंदर  हौसला है जीने का ।   “जो बीमारी को पीछे धकेलकर ज़िंदगी जीना चाहता  है” ।

       ठीक-ठाक लोगों से भी ज़्यादा हिम्मत दिखी उनमें ।

                    मैं तो बहुत ख़ुश थी उनको देखकर । “अगर वो  बीमारी की चिंता  करती  तो कब  की खाट पकड़ लेती” ।

       ख़ुद भी परेशान रहती और उनकी देखभाल करने वाले भी परेशान ही रहते ।

        हम जैसे तंदुरुस्त लोगों के लिए भी  मिसाल दिख रही थी ।  “खुलकर अपनी ज़िंदगी जी रही थी” ।

                जब कोई ज़्यादा ही टोकता तो एक ही बात बोल देती -- “जी तो लूँ”  । जो होगा देखा जाएगा । 

                    फिर बारात में जाने के लिए सबसे आगे खड़ी थी तैयार होकर । “उनमें इतना जोश देखकर मन को बहुत अच्छा लगा” । 

      सच्च में जी रही थी अपनी ज़िंदगी ।।

Comments

  1. Too gud
    Resumbles to kamlesh didi
    🙏

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  2. No words ma'am only salute

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  3. So well written! We miss buaji <3

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  4. Too good well explained mam

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  5. Excellent composition

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  6. Very strong and very beautiful my lovely friend kamlash khushi ke murti aap ko baar baar namen 🙏🙏💕❤️

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  7. Sachhi shardanjali to kamlesh ji

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