नई पहचान


                 रंजना माँ के साथ हर-रोज़ सुबह ही उठ जाती थी ।  “उनके साथ पहले घर का काम निपटवाती , फिर स्कूल चली जाती”। 

   “अपनी माँ को हमेशा बोलती थी —माँ तुम  देखना मैं एक नई पहचान बनाऊँगी” ।

                    उसकी माँ अनिता तो सुबह ही काम पर निकल जाती थी । “फिर वह पाँच-छह  कोठियां कर के ही घर आती थी” ।

        “इसलिए रात तक ही आ पाती थी”। ठीक-ठाक कमा लेती थी । अपने और बेटी के लिए ।

                  आज शाम जब घर आयी तो कुछ ज़्यादा ही थकी हुई थी । रंजना ने पूछा —माँ क्या हुआ । “आप तो बीमार जैसे लग रहे हो” । 

         कुछ नहीं । काम की ही थकावट है बस । रातभर सो करौ सुबह तक ठीक हो जाऊँगी —अनिता ने धीरे से बोला ।

                   आ जा बेटा खाना खा लेते हैं - “मैडम जी ने काफ़ी दिया है आज” ।  मैंने ही बनाया था । “बच गया तो उन्होंने घर ले जाने को बोल दिया” ।

     अपना तो कल सुबह का भी काम चल जाएगा - “रंजना ने खुश होकर हँसते हुए कहा” ।

                   रंजना ने माँ की ख़ूब तारीफ़ की । “खाते खाते बोला —माँ बहुत स्वाद बना है” ।

       “जो शादियों में हलवाई बनाते हैं ना,  बिलकुल वैसा”  ।    

                         खाना खाकर रंजना ने बर्तन साफ़ कर दिये । दोनों माँ बेटी लाइट बंद करके चारपाई पर लेट गई। “लेकिन अनीता की  नींद तो कोसों दूर थी” ।

       रंजना के बारे में सोच रही थी । “मेरे बाद इसका  क्या ?” 

                        अगर डॉक्टर वाली बात सच हुई तो । एक- दो महीना तो बहुत कम समय है । “तब तक इसकी  शादी नहीं हुई तो क्या होगा”।

       है भी तो अभी 16 साल की ही ।

                    “कैसे संभालेंगी गृहस्थी ?”   पीहर के बिना कितनी ही इज़्ज़त मिलती है लड़कियों को । “आनन-फ़ानन में कोई ग़लत रिश्ता हाथ ना लग जाए” ।

                     रंजना के पापा तो पहले ही नहीं थे । “और पता भी नहीं है कि दुनिया में है भी या नहीं” । एक दिन उनको छोड़ कर चले गए थे । 

       “फिर कभी वापस नहीं लौटे” । उसके बाद से ही तो वह बीमार रहने लगीं थीं । 

                 चारपाई पर लेटी सोचती रही , पता नहीं कब नींद आयी होगी । “सुबह रंजना ने ही उठाया —माँ उठो , आज तो लेट हो गई ” ।

                    जल्दी-जल्दी  नहा-धोकर अपने काम पर जाने के लिए तैयार हो गई । क्योंकि आज खाना तो बनाना ही नहीं था ।

      “रात का बचा हुआ ही गरम करके   ख़ा लिया दोनों ने ” ।

                पूरे रास्ते यही सोचती हुई गई कि ऐसे ही थकावट होती रही तो सारे काम छूट जाएंगे । “बीमार नौकरानी को कोई अपने घर काम भी नहीं देता” ।

                  रात को घर आते ही रंजना को बोला— “तुम भी कल से मेरे साथ ही काम पर चलना” । मिलकर जल्दी-जल्दी हो जाया करेगा ।

        “अब इतना तो पढ ही लिया कि अपना हिसाब-किताब कर लो ” । यही काफ़ी है ।

      रंजना के सिर पर हाथ रखकर बोला—“ठीक बोल रहीं हूँ ना, बेटी ”।

                  रंजना ने पहले तो रोना शुरू कर दिया । “अनिता  ने गले लगाकर चुप करवाया” । फिर माँ के समझाने पर  मान गई ।

                  अनिता भी इतना ही तो करना चाहती थी कि उसके पीछे से मेहनत करके ख़ा ले ।  “किसी के आगे हाथ ना फलाने पड़े” । 

       “जल्दी ही बड़ी कोठी वाले मैडम ने अपने ड्राइवर के बेटे से ही रंजना का रिश्ता पक्का करवा दिया” ।

                 अनिता खुश थी । बहुत बड़ी  चिंता जो दूर हो गई उसकी । “बार-बार ठाकुर जी का धन्यवाद कर रही थी” ।

                 हर रोज़ सुबह उठते ही सोचती थी कि आज का दिन भी निकल गया । फिर भगवान का धन्यवाद करती । 

                “अब दोनों माँ माँ-बेटी साथ ही काम पर जाने लगी” ।रंजना को एक-दो अलग कोठी में भी लगवा दिया था काम के लिए ।

    साथ ही जाती, एक दूसरे का काम निपटवाकर  साथ ही आ जाती ।

            रंजना को अब  “एक नई पहचान” मिल गई लोगों से  । जो उसने कभी सोची भी नहीं थी । “अनिता काम वाली की बेटी रंजना काम वाली ” …..  ।।

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