जंग जीत ली

                     नेहा घंटी बजा,दरवाज़ा खोलकर अंदर आ गई ।वह हमेशा ऐसे ही करती थी ।

     नमस्ते की ,और अपना काम शुरू कर दिया । 

                अचानक मैंने नोट किया —“थोड़ा सा काम करती और मुझे देखने लग जाती” ।

      उसने ऐसा एक घंटे में बहुत बार किया ।

              “मुझे  पता लग गया कुछ बात तो है जो यह  कह नहीं पा रही” ।

                 सुबह की भागदौड़ में खड़े होकर पूछने का समय ही कहाँ होता है । “उसके देखने के तरीक़े से क्या-क्या सोचने लगी मैं भी” ।

    हो सकता हो पैसे की ज़रूरत हो । पर माँगने में झिझक रही हो ।

                   चलो मैं ही पूछ  लूँगी जाते समय । अभी तो उसको काम करने दो ।  “नहीं तो बैठकर बातें मारना शुरू कर देगी”। 

    क्या पता कोई दुख दर्द बाँटना चाहती हो ।  और मैं अब भी  सोचे जा रही थी ।

             “ऐसा करते-करते एक घंटा व्यतीत हो गया” । अब तो उसके जाने का समय भी हो गया । “पर वह अब भी बोल नहीं पा रही थी” ।

      नेहा के घर में उथल-पुथल तो चलती ही रहती हैं । आज भी कुछ ऐसी ही बात मिलेगी ।

       “मेरे मन में ऐसे बहुत सारे ख़्याल आ रहे थे” ।

                 कई बार पहले ही पैसे ले जाती थी और महीना पूरे होने पर हिसाब कर देती । सामान भी कई बार माँग कर ले जाती थी । 

      “पर आज का समझ नहीं आ रहा है आख़िर बात क्या है” ?   

                 मैं सोच ही रही थी कि तभी  काम ख़त्म करके, “धीरे से आकर मेरे सामने खड़ी हो गई नेहा ” । 

              हमेशा की तरह खुलकर हँसते हुए बोली— मैडम एक बात पूछनी है आपसे । बुरा तो नहीं मानोगे । “पूछ ले क्या” ?

        मुझे भी एक बार तो हैरानी हुई कि आख़िर ऐसी क्या हो गया? 

               “जिसको  बोलने में इस ने एक घंटे से भी ज़्यादा समय लगा दिया” । और तो और अब भी यह पूछ रही ,पूछूँ या नहीं ।

      “अब मेरे से इजाज़त ले रही है” ।

                   खुद को शांत करते हुए मैंने बोला— हाँ हाँ पूछो क्या बात है । “झिझको नहीं जो तुम्हारे मन में है  बोल सकती हो” ।

                 फिर हँसते हुए बोली —“हमने झोपड़ी के पास ‘अरबी’  उगायी हुई है” । आप हमारी सब्ज़ी खा लोगे क्या ?

          बहुत अच्छी  भी लगी है ।  “आपको कल लाकर दे दें क्या” ? 

           सब बोलकर  “खुलकर हँसी नेहा । जैसे ख़ुद को मज़बूत कर लिया हो” ,अपनी बात बताकर ।  एक बार तो मैं भी तो ख़ूब हँसी उसकी बात सुनकर ।

              “पूरे समय पहेली बनाकर रखा उसने और बात क्या निकली” । अब उसकी बात सुन कर मेरा दिमाग़ शांत हुआ ।

      मैंने बोला —“हाँ हाँ ,क्यों नहीं खाएँगे” ।

                         ले आना कल तोड़कर ।मैं कल ही सब्ज़ी बना दूंगी । “उसकी ख़ुशी , जाने तक उसकी चाल,  मुस्कुराते चेहरे से साफ़-साफ़ झलक रही थी” ।

      गेट बंद करते-करते भी मुस्कुरा रही थी ।

      अपनी बात  बोलकर, नेहा ने जैसे “जंग जीत ली” थी ॥

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