समय से पहले

                  आदेश आज बैठे- बैठे अपने पुराने दिनों को याद कर रहा था ।  “वह नौ-दस  साल का ही रहा होगा, जब उन्होंने इस शहर में शिफ़्ट किया” ।   उससे पहले का जीवन उसको ज़्यादा याद भी तो नहीं था । 

       “बस थोड़ा-बहुत धुँधला सा, जैसे गली में नुक्कड़ की चीज़ों वाली दुकान” ।

     इस शहर में आकर तो जैसे समय को पंख लग गए  ।

                        पड़ोस में बहुत सारे बच्चे थे । कुछेक तो उसके दोस्त बन गए । “लेकिन एक-दो को लगता था कि वह पैसे और रुतबे में से उससे कहीं ऊपर है” ।

     “आदेश से अच्छे से बात भी नहीं करते थे ” ।

                  बार-बार महसूस कराते रहते  । “इसके तो पापा भी नहीं है और यह सरकारी स्कूल में पढ़ता है” ।

                   आदेश को हमेशा गर्व रहा अपनी माँ पर,  “जो अकेले ही सब कुछ कर रही थी” । उसको नहीं पता माँ -पापा अलग क्यों हुए ।

    “किसकी गलती से उनका घर बिखर गया” ।

               लेकिन माँ ने उसके लिए सपने देख रखे थे । “बेटे के सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत कर रही थी” ।

               अच्छी ख़ासी अकाउंटेंट की नौकरी है बैंक में । वैसे तो पैसे की कोई कमी नहीं देखी ।  “लेकिन कभी-कभी  उदासी महसूस करता था माँ की आँखों में भी” ॥

          कई बार माँ बोल भी जाती थी —“थोड़ी समझदारी दिखाई होती तो आज हालात कुछ और ही होते” ।  

                 “यानी कि पछतावा  है उन्हें किसी बात को लेकर” । लेकिन पूछते ही बोल देती—अभी बच्चा है पढ़ाई पर ध्यान दें बस ।

                   साल पर साल निकल रहे थे । अब तो आदेश कालेज भी जाने  लग गया था । कभी-कभी  पापा को भी याद करता था ।

       पर सोचता था —“अगर माँ को बोलेगा तो उन्हें बुरा लगेगा इसलिए चुप ही रहता ” ।

               घर में कहीं कोई फ़ोटो भी तो नहीं है उनकी । “अब तो याद भी नहीं कैसे दिखते थे” ।अक्सर सोचता रहता था यह सब  

। 

      “लेकिन कोशिश रहती थी कि  माँ को ऐसा न लगे कि  वह कुछ ऐसा भी सोचता है” ।

            माँ को भी छुप कर सिसकते देखा है उसने बहुत बार । “अपने  अंदर ही दर्द छिपा रखा है उन्होंने” ।

                “आदेश माँ से अपने मन की बात खुलकर बाँट नहीं सकता था”  । क्योंकि माँ इस बारे उससे  बात नहीं करती थी ।

               वह  यही सोचती थी कि  अभी इन बातों के लिए बहुत छोटा है ।बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करे ।

             “ वैसे बहुत मस्ती करता था माँ के साथ” । भूला  देता था कुछ देर सब  कड़वी दुखदायी यादों को ।  “माँ भी उसके साथ खुलकर हँसती  थी” । 

   और आदेश उनको हँसते देख बहुत ही ख़ुश होता था ।

                  “अब तो वह घर का काम भी सम्भालने लग गया था” ।.राशन वग़ैरह,बिजली के बिल  और भी घर की ज़रूरतें ।

     “ताकि माँ को भी थोड़ा आराम मिल सके” ।

                  माँ  बैंक जाने से पहले खाना  बना कर जाती है और आकर भी बनाती ।.”तो ऐसे में और घर के काम अब वह  ख़ुद की ज़िम्मेदारी समझनी लग गया था” ।

             वैसे तो माँ को अक्सर रविवार को घूमाने  भी ले  जाता था  । “अकेलापन महसूस ना करें, थोड़ा बदलाव हो जायेगा इसलिए ” ।

              लेकिन बहुत बार दिमाग़ में यही सवाल चलते रहते थे । “क्या पापा का दिल नहीं करता मुझसे मिलने का ? मुझे देखने का  ।  क्या हमें सच में भूल चुके हैं” ?

                 जब भी किसी भी बिना पहचान के नंबर से फ़ोन आता था , “तो आदेश को लगता —हो सकता है ये मेरे पापा का फ़ोन हो” ।  और भागकर उठा लेता था । 

                  “ग़लत नंबर  की आवाज़ को भी पहचानने की कोशिश करता” । काश़ ऐसा हो जाए कि ये मेरे पापा ही हो ।

    “लेकिन माँ को इस बारे में कुछ नहीं बताता था” ।

                   माँ हमेशा  बोलती थी — बहुत बड़ा हो गया है तू तो । “माँ को भी संभाल रहा है ओर घर को भी”।

          कभी-कभी आदेश को लगता ,जैसे उसका बचपन तो आया ही नहीं ।  

      “या फिर, शायद वह  ‘समय से पहले’ ही बड़ा  हो गया था” ।।

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