छनछनाती पाज़ेब


                    जब भी घर के बाहर खड़े होते , “उसे यूँ ही साइकिल पर कपड़े लाद कर जाते हुए ही देखते”।

     दोनों बहन -भाई अपने चाचा के साथ कपड़े प्रेस करने का काम  करते थे ।

                    “बारी-बारी से आते थे कपड़े लेने और देने” । उनके चाचा को तो बस, बड़ी सी मेज़ पर कपड़े प्रेस करते  हुए ही  देखा था ।  

       बुज़ुर्ग  तो नहीं है इतने । “लेकिन  दिन-रात मेहनत ने शायद शरीर का हुलिया ही बदल दिया है”।

                     वैसे तो प्रेस वाली लड़की का नाम रितु है । “जब भी मिलती हैं बस हल्का सा मुस्कुरा देती है” ।  और नमस्ते करके बड़े ही आत्मविश्वास  से बात करती है । 

                  “उसके चेहरे और उसकी आँखों से साफ-साफ झलकता है कि ईमानदारी से कमाकर ही  खाना है” । 

       रितु के नाम से नहीं , “सब उसे प्रेस वाली लड़की के नाम से ही जानते हैं” ।

                   अब बहुत दिनों से  दिखाई नहीं दिए दोनों बहन- भाई  । “किसी और को ही भेज रहे थे कपड़े लेने के लिए” । उनके लिए सोचकर चिंता  हो रही थी ।

   “ जैसे किसी अपने की होती है वैसे ही ” ।

     पता नहीं  क्या बात होगी ? 

                  फिर एक दिन पूछ ही लिया फ़ोन करके — सब बढ़िया है न ।  सेहत वग़ैरह ।    “जितने जोश से उसने फ़ोन उठाया उससे भी ज़्यादा जोश में आकर उसने बताना शुरू कर दिया ” ।  

     दीदी जी गाँव में आये हुए है । 

     “हमारी छठमैया पूजा थी ना इसलिए” ।

                   फिर चहकती हुई बोली —और भी ख़ुशख़बरी है हमारे पास आपको बताने के लिए । “वो हमारी सगाई होने वाली है जल्द ही” । अब तो उसके बाद ही आएँगे ,”घबराना नहीं” । 

       आपके कपड़े प्रेस ऐसे ही होते रहेंगे जब तक हम नहीं आते ।  

                  “खिसियानी सी हँसी हँसते हुए ख़ुद ही धन्यवाद भी बोल दिया” ।  फिर हँसते हुए बोली हमारा इंतज़ार तो नहीं किया ।

       “ हम जब आयेंगे आपको मिठाई ज़रूर खिलाएंगे” ।

                   फिर उसने हमारा तो बोलने का इंतज़ार ही नहीं किया । हम बधाई देना चाहते थे उसको । हम उसको —“सुनो -सुनो बोलते रह गए” ।

     “लेकिन उसने हँसते हुए फ़ोन काट दिया” ।

        फ़ोन रखते ही हमें भी बहुत हँसी आयी, “और ख़ुश भी थे उसकी बातें सुनकर” । 

                 “साफ सुथरे पानी जैसी बिना मिलावट बात की थी उसने ,  फिर हमने भी  पानी को हिलाने की  कोशिश नहीं की” । 

      जो-जो वह बता रही थी-“हूँ हूँ हूँ करके सुनते रहे” । 

                    अभी दिवाली पर ही आयी थी कपड़ों का हिसाब करने ।  “और दिवाली भी याद दिला दी बिना हिचक के “। 

     हक समझ रही थी शायद हम पर । 

     तभी खुलकर बोल दिया — “प्रेस के कपड़े भी दे दो और दिवाली के पैसे तोहफ़े भी दे देना” ।

                   “चलो अच्छा है ठीक घर मिल जाए बच्ची को” । कमाकर तो खा ही  लेगी । “बचपन से ही आदत है उसे मेहनत कर  कमाने की” । 

                    दस- पन्द्रह दिन यूँ ही बीत गए । एक दिन “सड़क से गुज़र ही रही थी तभी रितु दिखाई दी” ।  ऐसे ही हमेशा की तरह साइकिल पर कपड़े लाद कर ली जाती हुई ।

    “ आज  थोड़ी बदली-बदली सी थी” । 

    “पाज़ेब का शोर भी आ रहा था साइकिल की आवाज़ के साथ ही” ।

                    और जैसे ही मैंने मुड़कर देखा पैरों को आलता  लगाकर भी सजाए हुआ था । “फिर याद आया अरे उसकी तो सगाई होनी थी”।

                 “अलग ही नूर दिखाई दिया उसके चेहरे पर” । आवाज़ लगायी तो बस  सिर हिलाकर हँसती हुई निकल गई । 

    “अभी बहुत काम है दीदी जी , फिर मिलती हूँ” ।

      मैं उसको जाते हुए  देख मुस्कुरा रही थी ।

                      “उसकी  छनछनाती पाजेबों ने दूर तक हवा को बाँधे हुआ था” । बहुत देर तक भी मधुर संगीत सा सुनता रहा । 

    “ प्रेस वाली  आज “छनछनाती पाज़ेब” वाली लड़की बन गई” ।।

Comments

  1. Manju's attachment to the poor strata of the society reflects her politeness, etiquette & gentility. Only a pure soul can do this. God's affection is automatically bestowed to such souls.

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