सरदार जी अशोक

                   गली के एक छोर से दूसरे छोर तक पूरी निगरानी रखता था अशोक । “मजाल है कोई उसे बिना पूछे किसी के घर की घंटी बजा दें”  ।

    आने-जाने  वाले सब पर नज़र रखता  ।

                    जब कोई बोलकर जाता — घर का ध्यान  रखना ।  तो उसके दिमाग़ में एक बात बैठ जाती थी कि “भरोसा करके ही  कह कर गए हैं” ।

       ध्यान रखना मतलब— उनके वापिस आने तक ज़िम्मेदारी और बढ़ गई ।

    “फिर तो ज़्यादा चौकस होकर ड्यूटी करता” ।

                       अशोक के बाल इतने बड़े नहीं थे ,ना ही वह सिख लगता था । “लेकिन हमेशा ड्यूटी पर पगड़ी पहनकर ही आता था” ।

      एक दिन पूछने पर बोला—“सर  सिख हूँ , लेकिन पगड़ी और बाल रखने ज़रूरी  नहीं है” । 

                       परिवार वाले  चाहते हैं कि मैं पगड़ी पहनकर रखूँ । “उनकी बात भी रखनी है । और मुझे पगड़ी पहनने में कोई परेशानी भी नहीं है।”  बल्कि अच्छा ही लगता है ।

     “लोग ‘सरदार जी’ बोलकर इज़्ज़त देते हैं” ।

                      अपनी बात सही ढंग से समझाई अशोक ने । “चलो तुम इससे ख़ुश हो ना ,अच्छा है फिर तो” । लगन से काम करो , “तरक़्क़ी भी जल्द ही मिलेगी तुम्हें “।

              फिर क्या था , “तरक़्क़ी शब्द ज्यों ही मेरे मुँह से निकला  उसका चेहरा ही चमक गया” । इतना ख़ुश कि आकर  पैर पकड़ लिए । 

     बस आप लोगों का आशीर्वाद ही चाहिए ।    

       “फिर तो चार-पाँच दिन के बाद ही देखा उसको । 

शायद छुट्टी चला गया था” । 

                 अरे यह नया बन्दा कौन है । सबसे जा-जाकर मिल रहा है । “पूछने पर पता चला कि वह अपना अशोक ही है”।

“लग ही नहीं रहा था कि यह गली वाला गार्ड है”।

                    “पूरा सूट-बूट पहने, बिना पगड़ी के, बालों को भी तरीक़े से बनाये हुए” । साथ में उसकी पत्नी भी थी ।  शायद अभी हाल ही में शादी हुई होगी । 

    अनजान तो  देखकर भी नहीं बता सकता था कि   गली का   गार्ड है ।

    “ऐसा लग रहा था, जैसे इनमें से एक कोठी इसी की होगी” ।

                    मुझे देखते भाग कर आया । “साथ में उसकी पत्नी भी आकर पैर छूने के लिए झुकी”  । मैंने मना कर दिया — भगवान तुम्हें हमेशा ख़ुश रखें ।

          अपनी पत्नी से भी मिलवाया । “मैंने तारीफ़ की उन दोनों की बहुत अच्छे लग रहे हो” । 

      अरे अशोक आज तो साहब लग रहे हो । “पहचानना मुश्किल हो गया  कि यह हमारा ही अशोक है”  ।

     धन्यवाद सर । 

                      “एक दिन साहब भी बनूँगा साहब जी ,क़िस्मत साथ दे दे बस” । सरकारी नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया है आज ही । 

   “आप सब की दुआएँ साथ रही तो लग ही जाऊँगा” ।

                     लेकिन तब तक ख़ाली नहीं बैठूँगा । काम तो  करता ही रहूँगा । “उसकी पत्नी भी साथ में बड़ी समझदारी से जवाब देती रही” । 

                 पढ़ीं-लिखी थी शायद । हाव-भाव से भी लग रहा था । मैंने बहुत सारी दुआएँ दी, उनके भविष्य के लिए । 

        “दोनों एक दूसरे को इशारा करके नमस्ते कर वापिस क्लब की तरफ़ चल पड़े” । 

                  बाद में ही पता लगा हमें तो । क्लब में जो प्रोग्राम था,  “अशोक गार्ड ने ही व्यवस्थित  किया हुआ था ।  जिसमें उसकी पत्नी ने उसका साथ दिया” ।

   व्यवस्था के लिए सब कमेटी को धन्यवाद बोल रहे थे ।

   “ सबने बहुत तारीफ़ की ,खाना वग़ैरह बहुत ही अच्छा था” ।

                      अगले ही दिन, फिर उसको वैसे ही ड्रेस और पगड़ी पहने ड्यूटी पर बैठे देखा । हमने भी उसको हँसते हुए बोला — “अरे सरदार जी अशोक ,  लग ही नहीं रहा कल वाले ही हो” ।

   “सूट-बूट में तो अशोक साहब  ही  लग रहे थे” । और कल का सारा प्रोग्राम भी बहुत अच्छा था ।

                 शरमाकर सिर नीचे करके धन्यवाद किया । हँसते हुए बोला—  “क्या सर जी , सहाब  तो आप हैं”।

                    हमने बोला आप भी जल्द ही बन जाओगे ।ऐसे ही मेहनत करते रहना । “क्या पता क़िस्मत के साथ-साथ भगवान भी बाँह पकड़कर सफलता दिलवा  दे”।

      ख़ुश होकर फिर  पैर पकड़ने के लिए झुका ।

        “ मैंने उसे रोक कर  उसके कंधे पर हाथ रखा - बस-बस “सरदार जी अशोक” । और पार्क की चल पड़ा ।

                       फिर उसे मुड़कर देखने का मन किया —अशोक अब भी वहीं खड़ा , “पगड़ी ठीक करता हुआ मुस्कुरा रहा था” । 

        और उसके चेहरे पर आत्मविश्वास पहले से भी ज़्यादा झलक  रहा था  ।।

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