बुआ का रौब

                       उमर यही कुछ 85 साल तो हो चुकी होगी उनकी । “लेकिन  लग नहीं रही थी । अभी भी वही रोबीली आवाज़” ।

          ऐसे ही आँखों से घूरकर देख रहे थे । सब वैसा ही तो  था । “जैसा  50 साल पहले होता था” । 

        इनके देखने मात्र से डर लगता था हमें भी । “मुँह से शब्द भी नहीं निकाल पाते थे” ।

                  एक बात बोलती थी हमेशा—“तेरे बाप की बड़ी बहन हूँ मैं , कहना मान लिया करो मेरा” । और हम पिटाई के डर से चुप रह जाते थे । 

                  आज तीन-चार साल बाद देखा उनको । सबसे मिलने के बाद हम उनसे  मिलने  गए । “तो आज भी वैसे ही ग़ुस्से से घूरते ही मिली” ।

         ज्यों ही उनके पास पहुँचे, पहले ही डांटना शुरू कर दिया — “संभाल लिया क्या अपनी बुआ को” । 

                    दिखाई तो दे ही गई थी बैठी हुई । “लेकिन मुझसे मिलने की फ़ुरसत कहाँ है” ? और भी बहुत कुछ सुना दिया एक साथ ही ।

            “ये उनका प्यार था जो नाराज़गी दिखा रहा था  कि सबसे पहले मुझे मिलो आकर” ।

       “मेरी सुनो । मेरे पास बैठो” । 

                    उनके पास कुर्सी सरका-कर  बैठते ही उन्होने बोलना शुरू कर दिया ।  “रोकना पड़ा बीच में ही , सबसे ही नाराज़गी थी शायद उनको” ।

                   नाख़ुश दिख रही थी । मैंने गले लगाकर बोला —छोड़ो न बुआ ।  “आज तो हम सबसे मिलने के लिए आये हैं ना । सबके साथ ख़ुश रहो” ।

         आज जितना समय  यहाँ रहेंगे इन पलों को जी लेते हैं । “फिर तो पता नहीं हम कब मिलेंगे”  । 

             पर बुआ को आराम कहाँ । “जो भी दिख रहा था डाँटकर,  नाराज़गी दिखा रही थी” ।

                       लेने देने पर भी आपत्ति थी उनको तो । लेकिन बार-बार बोल रही थी । “आज जिसने बुलाया  बहुत बड़ा  जिगर है उसका” ।  

        तभी सभी को  न्यौता दिया है । “शुक्र है किसी एक से तो खुश हुए” । 

       अपने छोटे भाई को  देख कर, खिल  ही गई  ख़ुशी से ।

                ख़ूब बातें की।  “बीच-बीच में बड़ी होने का रुतबा भी बरकरार रखा” । शिकायतें भी  की ।

                   मेरे पास मिलने क्यों नहीं आता । तेरी बहन पता नहीं अब कितने दिन की है । “बुआ  ने अपना दिन भी सोच रखा है कि उस दिन मैं इस संसार से चली जाऊँगी” । 

      “बड़े ही विश्वास के साथ बता रही थी—  दिन पक्का है” ।

                    अपने बहू बेटों के साथ आयी थी । उनको देख- देखकर भी ख़ुश हो रही थी ।

                  “अचानक वह उठकर चलने के लिए तैयार हो गई ” । और अपनी बहुओं को आवाज़ देकर बुला लिया । “तभी किसी ने उनको रुकने के लिए बोला” —आज तो रुक जाओ बुआ ।

                 “लेकिन बुआ का इतना ही मन था रूकने का ” । अपना रौब बरकरार रखते हुए ज़ोर देकर बोला —“बस सब से मिल ली वही काफ़ी था” ।

        अब उनको अपने घर वापस जाना था अपने शहर ।

     “ रोकने से भी नहीं रुके” ।

                  “पूरे घर की दीवारों को हाथ लगा-लगाकर चल रही थी जैसे एक दिन में सारी यादें ताज़ी कर रही हो” । 

                गाड़ी में बैठने से लेकर सड़क के मुड़ने तक हँसते हुए मुड-मुड़कर देखती रही सबको । अपने हाथ हिला-हिलाकर राम-राम बोलती रही ।

              “आज तो बहुत ही ख़ुश होकर गई है” । इसलिए मुस्कराती हुई जा रही थी । “नहीं तो ज़्यादातर नाराज़ होकर ही जाती है” ।

  सारी उम्र “बुआ का रौब” देखते बड़े हुए हैं ।

             मेरी दुआएँ उनकी उम्र ओर सेहत के लिए दिल से  निकल रही थी “और आँखों से आँसू भी” ।यह सोचकर कि   “क्या पता अब कब मिलेंगे….॥

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