बिल्कुल बेफिक्र

                   किसी ने देखा क्या उसको —सब आपस में यही फुसफुसा रहे थे । अब भी वैसा ही है , वैसे ही बात करने का लहजा भी  ।

        “बहुत देर तो  मैं सोचती ही रही कि ऐसा कौन है जिसकी चर्चा आज सबकी ज़ुबान पर हो गई है”।

      शादी का माहौल था । “पर बात उसकी हो रही थी”।

      “दुनिया भर के रिश्तेदार बैठे थे लेकिन ज़िक्र उसका चल रहा था”।

                   लो भाई आज के विषय का इंतज़ाम भी हो गया  । अब कोई भी रिश्तेदार शादी में बोर नहीं होगा —“किसी ने हँसते हुए कहा”।

          तभी मुस्कुराते हुए वह हमारी तरफ़ आता दिखा । 

         “चुप-चुप —सभी ने एक दूसरे को टोका  । इधर ही आ रहा है”।

                   ज्यों ही  मैंने मुड़कर देखा ठीक मेरे पीछे ही खड़ा था । “वह बहुत  खुश था सबसे मिलकर” । मैंने भी मुड़ते ही उन्हें अभिवादन किया ।

        हमें तो अच्छा लगा इतने दिनों बाद उनको देखकर  ।

         “ हाँ था तो थोड़ा अजीब सा”।

                        आज भी बड़े अजीब ही कपड़े पहनकर आया हुआ था  । “लेकिन वह तो ख़ुश था पहनकर  । दूसरों से उसको क्या लेना”।

                       इतने सालों में बिल्कुल  बदल गया था ।बहुत बड़ी पोस्ट पर ऑफ़िसर होता था किसी ज़माने में ।

         “रिटायरमेंट  लेकर ख़ुद को ही बदल लिया उसने तो”।                           

            किसी पंथ का नाम ले लिया था शायद । “सब बात तो यही कर रहे थे”।

                  शायद क्या —सच में ही  । उसी के अनुरूप ख़ुद को ढाल लिया था । “जैसे भगवान की सखी ही बन गया हो ,जो सारा दिन उनकी भक्ति में लीन रहती है”।

                बातचीत करने में नहीं बदला था वैसे तो , बस ख़ुद को बदल लिया और अपनी भगवान का नाम लेना शुरू कर दिया उसने  । 

         “ऐसी बातें करता रहा जैसे हर रोज़ ही मिलता है सबसे”।

          सब रिश्तेदार चलने लगें लेकिन उसने तो चलने की इच्छा भी ज़ाहिर नहीं की ।

                   “वह तो मन बनाकर आया था शादी में  । पूरी तरह से ही शामिल होना है , मतलब पूरी तरह”।

                  “तभी उसने धीरे से इशारा किया पास खड़े रिश्तेदार को और वह भी जल्द ही समझ भी गया”।

       और मुस्कुराते हुए बोला सब इंतज़ाम है  । बेफिक्र रहो ।

                      “ बस थोड़ा रिश्तेदारों को जाने दो”। यह सुनते ही जैसे उसमे दोगुनी ऊर्जा आ गई थी । “पुरानी-पुरानी बातें  याद करके सुनाने लगा”।

           पूछता रहा ख़ुद के बचपन और माता पिता के बारे में  ।

         बीच-बीच में अपनी और अपने बच्चों की भी बताता रहा  । दोनों की शादी कर चुका था  ।

                       “वह कितना मस्त  था बिल्कुल  बेफिक्र और हम उसकी ही चर्चा में  लगे हुए थे”। वह पहले  ऐसा था वह अब ऐसा है , बस यही बातें ।

          हम इन सब में ही उलझे रहे  । 

                  ज़्यादातर रिश्तेदार  एक-एक करके जा रहे थे  । आज का प्रोग्राम ख़त्म जो हो गया था  । 

        “और वह भी उस मेज़ के पास जा रहा था जिस इंतज़ाम की बात वह थोड़ी देर पहले कर रहा था”।

        “किसी से कोई गिला- शिकवा जाहिर नहीं कि तुम्हारे बारे में क्या बातें कर रहे है”।

       सबकी बातें सुनकर हँसते ही रहा लेकिन किसी को अपशब्द नहीं बोले ।

                      “शायद हम जैसे लोगों को सलाह दे रहा था कि तुम भी खुश रहा करो , ऐसे तांक-झाँक छोड़कर” ।

          बात करते हुए यह भी  कह रहा था  कि अपनी ज़िंदगी अपने तरीक़े से व्यतीत करके देखो  ।

     “ देखो कितना मज़ा आता है” ।

                   “ लेकिन हम तो उसकी ही बाते कर रहे थे जैसे हमारे पास करने को दूसरी बात बची ही नहीं थी”।

                 शादी में मिला विषय चल ही  रहा था अब तक भी  घर पहुँचने तक । 

                     “वह यहाँ भी अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से बिताने की तैयारी में था”। आज की अपनी खुशियों का इंतज़ाम अपने तरीक़े से कर लिया उसने  ।

       “बिलकुल बेफिक्र होकर”।।

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