दबी ज़ुबान
वह कभी नहीं चाहती थी कि हमेशा यही रहे । “लेकिन उसके पति राम ने उसकी नहीं सुनी” । तीन मंज़िला घर बनकर तैयार हो गया था अब तो ।
“तीनों मंजिलों पर एक-एक परिवार आराम से रह सकता है “।
बच्चे भी अपना कमा-खा रहे हैं । दोनों को एक-एक मंज़िल दे ही देते हैं ।”पास भी रहेंगे और इनका बाहर भी ख़र्चा नहीं होगा” ।
ऐसी बहुत सारी बातें सोच-सोचकर उथल-पुथल चल रही थी दिमाग़ में ,”नींद ही नहीं आ रही थी” ।
आज तो बहुत सारे निर्णय ले लिए थे उसके दिमाग़ ने —“कि नाती-पोतों को यहाँ कभी बाहर नहीं जाने दूँगी” । घर के अंदर ही खेलते रहेंगे ।
“उनके लिए माहौल ठीक नहीं है यहाँ का”।
जहाँ पर उनका घर था वह मोहल्ला मज़दूर लोगों का था ।
“ यहाँ माली, दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले, छोटे मोटे कारोबार करने वाले लोग सब एक बस्ती में ही रहते थे”।
यह लोग भी उनमें ही रच-बस गए थे अब तो ।सालों से यहाँ ही तो है “बच्चे भी यही पले-बड़े, यही पढ़े-लिखे” ।
और तो और बच्चों की शादी भी यही रहते हुए की है ।
“ वैसे तो कभी भी नहीं लगा कि हम किसी ग़लत जगह पर रह रहे है क्योंकि वह बाहर भी कम ही खड़े होते थे”।
अब सुनीता और उसके पति राम ने बाहर काम पर जाना बंद कर दिया था । “घर ख़र्च में कोई परेशानी तो थी ही नहीं”।
गाँव की खेती से भी आ जाता था थोड़ा- बहुत । “इसलिए पहली वाली भागदौड़ अब बंद हो गई थी”।
बहुत बार मौक़ा मिला इस मोहल्ले से बाहर जाने का । लेकिन फिर भी नहीं गए । “सुनीता की कभी नहीं सुनी राम ने”।
“शादी होते ही इस गली में आकर बस गई थी और तब से यह मोहल्ला उनका अपना बन गया था”।
यह सब बातें दिमाग़ में फ़िल्म के जैसे घूमे जा रही थी । “तभी सड़क पर शोरगुल सुनकर भागकर खड़ी हुई । बड़े ज़ोर से झगड़ा हो रहा था घर के बाहर ही”।
“ कुछ लोग शराब पीकर हाथापाई कर रहे थे”।
शोर इतना कि छोटी नातिन भी नींद से उठ गई । “उनको लड़ता सुनकर बच्चे ने रोना शुरू कर दिया”।
“ कैसे भी करके उनको अपने घर के आगे जाने को राज़ी किया”।
“ वैसे तो यह हर रोज़ का ही काम था यहाँ का । आज भी कोई नई बात तो नहीं थी”।
इसलिए कभी-कभी दिल करता था कि इस मकान को बेचकर किसी अच्छी जगह चले जाए । “ऐसी जगह जहाँ पर बच्चे भी खुलकर खेल सके”।
“ लेकिन राम के आगे उसकी ज़ुबान ही दब जाती थी या यूँ कहें कि वह बहसबाजी में नहीं पड़ना चाहती थी”।
बच्चे भी तो यहाँ नहीं रहना चाहते थे ।
“ समस्या यह भी थी कि इतने थोड़े पैसों में अच्छी जगह मकान भी तो नहीं मिलेगा” ।
राम तो इस जगह को छोड़ने को तैयार ही नहीं था “उसे अपने घर और गली से ज़्यादा ही लगाव हो गया था”।
हमेशा यही बात बोलता था—यहाँ भी सब तरह के लोग हैं
“जो ख़ुद भी क़ामयाब हुए है और बच्चों को भी लायक़ बना रहे है”।
आज फिर से, कहीं और मकान लेने की बात करते ही राम तुरंत बोला—“क्या गारंटी है कि हम जहाँ भी जाएंगे वह पर माहौल यहाँ से बहुत अच्छा मिलेगा”।
“हम तो यहाँ से नहीं जाएंगे” । अगर बच्चों का दिल करता है तो चले जाएंगे । उनको हम नहीं रोकते ।
“ हम ऊपर वाले मकान को किराया पर चढ़ा देंगे”। पक्का फ़ैसला सुना दिया फिर से हमेशा की ही तरह । और चुपचाप जाकर सो गया ।
सुनीता भी समझ गई कि अब कुछ और कहने का कोई फ़ायदा नहीं है”। आज भी चुप ही रही ।
बस “दबी ज़ुबान” से “ हूँ कहकर सोने की कोशिश करने लगी” ॥
Nice one
ReplyDeleteGud one
ReplyDeleteWell written mam
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteBhut khub
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