अच्छा टाइम पास

                     मिस्टर और मिसेज़ शर्मा सबसे आगे खड़े हुए थे , “हाथ में मंदिर का दिया हुआ झंडा  लेकर” ।  

         गले मिलकर हंसकर बातें करना , यह तो उनके स्वभाव में ही था  ।

                   “ लेकिन   पहले कभी उनको देखा नहीं ऐसे किसी पब्लिक समारोह में” ।  हो सकता हो आज दिल किया हो । 

    “ या फिर अब धर्म में आस्था बढ़ गई हो” ।

                   सारा दिन समय व्यतीत करने के लिए उनको रूप- रेखा ही बनानी पड़ती थी ।  बच्चे अपने-अपने परिवार में व्यस्त थे । 

      “ना उनको इनका इंतज़ार था । ना इनको बच्चों का” ।

     यह भी अपने रहन-सहन के बंधन में नहीं बंधना चाहते थे ।

                       “उनके विषय में ही सोच रही थी  तभी मिसेज़ शर्मा ने आवाज़ लगायी” — रंजना  तुम भी आयी हो आज । “कैसे समय मिला  ,कामकाज से फ़ुर्सत मिल ही गई” ।

        मैंने भी थोड़ा हंस कर बोला — “जी,  निकाल ही लिया समय । आप सब से मिलने के लिए” ।

                     तभी एक आंटी और आ गई । वह भी बहुत ख़ुश लग रही थी । सब एक दूसरे के गले मिल रहे थे । “लग रहा था जैसे कोई मिलन समारोह हो आज” ।

     “भगवान से तो किसी को कोई सरोकार नहीं था” । 

                        धीरे-धीरे  बहुत से जान-पहचान वाले नज़र आ गए । “जो सालभर से  नहीं दिखे थे  वह भी आज दिखाई दे रहे थे”।        

      सबकी एक ही बात । सोचा—“चल ही पड़ते हैं । इस बहाने सबसे मिलना भी हो जाएगा” ।

                      सभी ने हाथों में मंदिर के भगवान से संबंधित बैनर और झंडे ले लिए  । और लाइन बनाकर जयकारा लगाते हुए परिक्रमा करने  लगे । 

      “बीच-बीच में मुड़-मुड़कर भंडारे की थालियों  पर भी नज़र डाल रहे थे” ।

                     इस प्रोग्राम के बाद प्रसाद का प्रबंध भी था । “मिसेज़ शर्मा ने तो ड्राइवर और हेल्प सर्वेंट को भी बोल दिया था” । 

     “आज दोपहर का खाना मंदिर में मिलेगा । ठीक समय पर पहुँच जाना दोनों” ।

                    अकेला शर्मा परिवार ही नहीं,  सबको देखते ही समझ आ रहा था । “सबका अच्छा समय व्यतीत हो रहा है” ।

     कम से कम चार-पाँच घंटे तो बीतेंगे ही । 

     “घर तो अकेले ही बैठे रहते । रौनक़ में  मन लगा हुआ है” ।

                   जाकर खाना भी नहीं बनाना आज तो ।” बिल्कुल फ़्री होकर आए थे” ।  चाहे कितना भी टाइम  लग जाए ।

   “सब लोग एक-दूसरे  को हंसते हुए कह रहे थे” ।

                   “लेकिन  जिस प्रोग्राम के लिए सब  एकत्रित हुए थे ,  उसके लिए  श्रद्धा तो बस तीन-चार परिवारों में ही दिखी” । जो  समर्पित भाव से भगवान को याद कर रहे थे ।

       “बाक़ी तो सच में ही समय व्यतीत करने आये हुए थे” ।

                        “कुर्सियों पर बैठे लोग अब भी लाइन में लगे हुए लोगों को बार-बार निहार रहे थे” ।  शायद कोई और भी जान पहचान का मिल जाए । 

       “कुछेक तो बार-बार  अपने फ़ोन को   देख रहे थे” । क्या पता कोई मेसेज हो और उन्हें पता ना चले । 

       “उनका तो बस टाइम पास प्रोग्राम चल रहा था  जो घर भी करना था और यहाँ भी कर रहे थे” ।

                       थोड़ी देर में समारोह का समापन हो गया । पंडित जी ने आरती करवाई , “प्रसाद का भोग लगाया और फिर प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह किया” ।

     सभी ने लाइनें बनायी और प्रसाद लेकर पास रखी कुर्सियों पर ही बैठकर ग्रहण कर लिया ।

                      “लेकिन जाते-जाते अपने-अपने साथ लाये टिफ़िन भी भरवा लिए” । घर पर इंतज़ार में है परिवार वाले,  कि   

   “हम लोग उनके लिए भी प्रसाद लेकर आएंगे” ।

     “जाते-जाते भी एक दूसरे को मिलकर बोल रहे थे” । आज तो अच्छा टाइम पास हो गया । 

                          प्रोग्राम भी अच्छा था । “आगे भी ऐसे प्रोग्राम होते रहें तो अच्छा है । घर तो ख़ाली ही बैठना था” ।इसी बहाने मिलना होता रहेगा ।

         “इन सब वार्तालाप में भगवान का कहीं भी ज़िक्र नहीं था” ।

      ज़िक्र था तो 4 घंटे “अच्छा टाईम पास”  होने का। ।।


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